ऋण वसूली और एनपीए (Non-Performing Assets) – संपूर्ण मार्गदर्शिका

भाग 1: एनपीए अवधारणा 

1.1 परिचय और ऐतिहासिक संदर्भ

एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) वे ऋण या अग्रिम हैं जहां मूलधन या ब्याज की किस्तें 90 दिनों से अधिक समय तक भुगतान नहीं की गई हैं। भारतीय बैंकिंग प्रणाली के लिए एनपीए एक गंभीर चुनौती रही है, जिसका सीधा प्रभाव बैंकों की लाभप्रदता, पूंजी पर्याप्तता और समग्र वित्तीय स्थिरता पर पड़ता है।

ऐतिहासिक विकास:

  • 1991: नरसिम्हम समिति की सिफारिशों के बाद एनपीए मानदंड शुरू

  • 1993-94: वास्तविक एनपीए मान्यता प्रारंभ

  • 2004: संपत्ति वर्गीकरण में संशोधन

  • 2014: विजयन समिति गठन

  • 2016: दिवाला और दिवालियापन संहिता लागू

  • 2021: COVID-19 राहत उपायों के तहत अस्थायी छूट

1.2 एनपीए का आर्थिक प्रभाव

बैंकों पर प्रभाव:

  • लाभप्रदता में कमी (लाभ पर प्रावधान प्रभाव)

  • पूंजी पर्याप्तता अनुपात (CAR) पर दबाव

  • तरलता संकट की संभावना

  • नए ऋण देने की क्षमता सीमित

अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:

  • बैंक ऋण में कमी → निवेश सिकुड़न

  • ब्याज दरों पर दबाव

  • वित्तीय प्रणाली में अविश्वास

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर सरकारी बोझ

उधारकर्ताओं पर प्रभाव:

  • क्रेडिट रेटिंग प्रभावित

  • भविष्य के ऋण की उपलब्धता सीमित

  • कानूनी कार्रवाई का जोखिम

1.3 एनपीए निर्माण के कारण

आंतरिक कारक:

  1. साख मूल्यांकन में कमियाँ: अपर्याप्त जोखिम मूल्यांकन

  2. परियोजना मूल्यांकन त्रुटियाँ: व्यवहार्यता अध्ययन में खामियाँ

  3. निगरानी कमजोरियाँ: ऋण निधि के उपयोग पर अपर्याप्त नियंत्रण

  4. आंतरिक नियंत्रण प्रणाली: जोखिम प्रबंधन प्रणाली कमजोर

  5. मानव संसाधन सीमाएँ: प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की कमी

बाहरी कारक:

  1. आर्थिक मंदी: बाजार में गिरावट, मांग कमी

  2. प्राकृतिक आपदाएँ: बाढ़, सूखा, महामारी

  3. नीतिगत बदलाव: सरकारी नीतियों में अचानक परिवर्तन

  4. तकनीकी परिवर्तन: प्रौद्योगिकी अप्रचलन

  5. कानूनी विवाद: लंबित मुकदमेबाजी, भूमि अधिग्रहण मुद्दे

  6. मूल्य श्रृंखला व्यवधान: कच्चे माल की आपूर्ति बाधित

उद्देश्यपूर्ण डिफॉल्ट:

  • ऋण भुगतान से बचने की जानबूझकर रणनीति

  • कॉर्पोरेट प्रशासन में कमजोरियाँ

  • एकाधिक बैंकों से ऋण लेना (साइलो ऋण)

भाग 2: SMA (विशेष उल्लेख खाते) – वर्गीकरण

2.1 SMA-0 (1-30 दिनों की देरी)

परिभाषा: मूलधन या ब्याज का भुगतान 1-30 दिनों तक बकाया हो।

विशेषताएँ:

  • प्रारंभिक चेतावनी संकेत

  • तत्काल निगरानी आवश्यक

  • निवारक कार्रवाई का अवसर

बैंक कार्रवाई:

  1. उधारकर्ता से संपर्क स्थापित करना

  2. देरी के कारणों का विश्लेषण

  3. अस्थायी नकदी प्रवाह समस्याओं के लिए समाधान तलाशना

  4. भुगतान योजना पुनर्निर्धारण पर विचार

2.2 SMA-1 (31-60 दिनों की देरी)

परिभाषा: मूलधन या ब्याज का भुगतान 31-60 दिनों तक बकाया हो।

विशेषताएँ:

  • गंभीर चेतावनी स्तर

  • संभावित एनपीए में परिवर्तन का उच्च जोखिम

  • संरचनात्मक समस्याओं के संकेत

बैंक कार्रवाई:

  1. औपचारिक चेतावनी नोटिस जारी करना

  2. उधारकर्ता की वित्तीय स्थिति का गहन विश्लेषण

  3. ऋण पुनर्गठन पर विचार (यदि व्यवहार्य हो)

  4. संपार्श्विक का मूल्यांकन और सुरक्षा सुनिश्चित करना

  5. क्रेडिट निगरानी तंत्र को सक्रिय करना

2.3 SMA-2 (61-90 दिनों की देरी)

परिभाषा: मूलधन या ब्याज का भुगतान 61-90 दिनों तक बकाया हो।

विशेषताएँ:

  • अत्यंत गंभीर स्थिति

  • एनपीए में परिवर्तन निश्चित (90+ दिनों पर)

  • त्वरित और निर्णायक कार्रवाई आवश्यक

बैंक कार्रवाई:

  1. कानूनी कार्रवाई शुरू करने की तैयारी

  2. ऋण वसूली प्रकोष्ठ को सूचना

  3. संपार्श्विक तलब करने की प्रक्रिया शुरू

  4. दिवाला कार्यवाही के विकल्प तलाशना (यदि लागू हो)

  5. RBI के निर्देशानुसार प्रावधान बनाना

भाग 3: एनपीए वर्गीकरण

3.1 मानक संपत्ति (Standard Asset)

परिभाषा: ऐसी संपत्ति जो 90 दिनों से कम समय से बकाया है और कोई जोखिम नहीं दिखाती।

विशेषताएँ:

  • नियमित भुगतान हो रहे हैं

  • कोई चूक नहीं

  • सामान्य जोखिम स्तर

प्रावधान आवश्यकता:

  • 0.25% से 1% तक मानक प्रावधान (ऋण के प्रकार पर निर्भर)

3.2 उप-मानक संपत्ति (Sub-Standard Asset)

परिभाषा: ऐसी संपत्ति जो 12 महीने से कम समय से एनपीए है।

विशेषताएँ:

  • 90 दिनों से अधिक समय से बकाया

  • मूलभूत कमजोरियाँ दिखाई देती हैं

  • भविष्य में भुगतान की संभावना कम

प्रावधान आवश्यकता:

  • बिना सुरक्षा वाले ऋण: 10%

  • सुरक्षित ऋण: 15%

3.3 संदिग्ध संपत्ति (Doubtful Asset)

परिभाषा: ऐसी संपत्ति जो 12 महीने से अधिक समय से एनपीए है।

विशेषताएँ:

  • लंबी अवधि से बकाया

  • भुगतान की संभावना संदिग्ध

  • परिसंपत्ति के मूल्यह्रास का उच्च जोखिम

वर्गीकरण:

  • D1: 12-18 महीने से एनपीए

  • D2: 18-24 महीने से एनपीए

  • D3: 24 महीने से अधिक समय से एनपीए

प्रावधान आवश्यकता:

  • D1: 25%

  • D2: 40%

  • D3: 100%

3.4 हानि संपत्ति (Loss Asset)

परिभाषा: ऐसी संपत्ति जिसे बट्टे खाते में डाला जा चुका है या बट्टे खाते के योग्य है।

विशेषताएँ:

  • भुगतान की कोई संभावना नहीं

  • संपार्श्विक मूल्यहीन

  • आंतरिक या बाहरी लेखा परीक्षकों द्वारा हानि के रूप में पहचान

प्रावधान आवश्यकता:

  • 100% प्रावधान आवश्यक

भाग 4: प्रावधान बनाना – RBI निर्देश

4.1 आरबीआई दिशानिर्देश: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

विकास कालक्रम:

  • 1992: प्रावधान मानदंड शुरू

  • 2005: संपत्ति वर्गीकरण संशोधित

  • 2015: गतिशील प्रावधानिंग शुरू

  • 2018: एनपीए मानदंड कड़े (180 दिन से 90 दिन)

  • 2021: COVID-19 राहत के तहत संशोधन

4.2 वर्तमान प्रावधान मानदंड

1. मानक संपत्ति:

  • खुदरा ऋण: 0.40%

  • कृषि और एमएसएमई: 0.25%

  • आवासीय ऋण: 0.25%

  • वाणिज्यिक रियल एस्टेट: 1%

  • अन्य: 0.40%

2. उप-मानक संपत्ति:

  • सुरक्षित: 15%

  • असुरक्षित: 10%

  • कृषि ऋण: समान

3. संदिग्ध संपत्ति:

  • 1 वर्ष तक: 25%

  • 1-3 वर्ष: 40%

  • 3 वर्ष से अधिक: 100%

4. हानि संपत्ति:

  • 100% प्रावधान

4.3 विशेष प्रावधान मामले

कॉर्पोरेट दिवाला समाधान:

  • IBC प्रक्रिया में ऋण: विशेष प्रावधान

  • NCLT के समक्ष मामले: समयबद्ध प्रावधान

COVID-19 राहत उपाय:

  • मोरेटोरियम अवधि: विशेष उपचार

  • पुनर्गठित ऋण: संशोधित प्रावधान

कृषि ऋण:

  • प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित: विशेष प्रावधान

  • फसल ऋण: मौसमी प्रावधान

4.4 प्रावधानिंग प्रक्रिया

चरण-दर-चरण प्रक्रिया:

  1. संपत्ति वर्गीकरण:

    • नियमित समीक्षा (मासिक/त्रैमासिक)

    • उम्र-आधारित वर्गीकरण

    • जोखिम आकलन

  2. प्रावधान गणना:

    • बकाया राशि निर्धारण

    • संपार्श्विक मूल्यांकन

    • वसूली योग्य राशि अनुमान

    • प्रावधान राशि गणना

  3. लेखांकन प्रविष्टियाँ:

    • लाभ-हानि खाते में चार्ज

    • संतुलन पत्र में प्रावधान निधि

    • टैक्स उपचार

  4. नियामक रिपोर्टिंग:

    • RBI रिटर्न (NPA प्रारूप)

    • वार्षिक रिपोर्ट में प्रकटीकरण

    • ऑडिट रिपोर्ट

4.5 चुनौतियाँ और समाधान

चुनौतियाँ:

  1. प्रावधानों का लाभप्रदता पर प्रभाव

  2. पूंजी पर्याप्तता बनाए रखना

  3. संपार्श्विक मूल्यांकन में विसंगतियाँ

  4. कानूनी प्रक्रियाओं में देरी

समाधान:

  1. चरणबद्ध प्रावधान नीति

  2. पूंजी पर्याप्तता योजना

  3. स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता नियुक्त करना

  4. वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र


भाग 5: एनपीए प्रबंधन और वसूली तंत्र

5.1 रोकथाम रणनीति

  1. साख जोखिम प्रबंधन:

    • उन्नत क्रेडिट स्कोरिंग मॉडल

    • व्यापक पूर्व-ऋण मूल्यांकन

    • निरंतर निगरानी तंत्र

  2. प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली:

    • SMA ट्रैकिंग

    • वित्तीय अनुपात विश्लेषण

    • बाजार बुद्धिमत्ता

  3. ऋण पुनर्गठन:

    • कॉर्पोरेत ऋण पुनर्गठन (CDR)

    • स्ट्रेस्ड ऋण पुनर्गठन (SDR)

    • सतत संरचना (S4A)

5.2 वसूली तंत्र

  1. गैर-न्यायिक तंत्र:

    • Lok Adalat

    • ऋण वसूली ट्रिब्यूनल (DRT)

    • SARFAESI अधिनियम, 2002

  2. न्यायिक तंत्र:

    • दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016

    • कंपनी अदालतें

    • सिविल कोर्ट

  3. वैकल्पिक तंत्र:

    • संपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियाँ (ARCs)

    • ऋण संपत्ति विनिमय

    • संपत्ति बिक्री

5.3 आरबीआई की भूमिका और पहल

  1. नियामक ढांचा:

    • मास्टर सर्कुलर जारी करना

    • निरीक्षण और पर्यवेक्षण

    • डेटा संग्रह और विश्लेषण

  2. विशेष पहल:

    • फोकस्ड रिज़ॉल्यूशन (संकल्प) योजना

    • प्रूडेंट नॉर्म्स (मानदंड) पर कार्य समूह

    • स्ट्रेस टेस्टिंग फ्रेमवर्क

  3. तकनीकी नवाचार:

    • क्रेडिट इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (CIBIL)

    • सेंट्रल फ्रॉड रजिस्टर

    • डिजिटल ऋण ट्रैकिंग


एनपीए के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: एनपीए क्या है और इसे कैसे परिभाषित किया जाता है?

A: एनपीए वह ऋण या अग्रिम है जहां मूलधन या ब्याज की किस्त 90 दिनों से अधिक समय तक भुगतान नहीं की गई है। यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा निर्धारित मानदंड है।

Q2: SMA-0, SMA-1 और SMA-2 में क्या अंतर है?

A: SMA-0 (1-30 दिन देरी), SMA-1 (31-60 दिन देरी), SMA-2 (61-90 दिन देरी)। ये एनपीए बनने से पहले की चेतावनी श्रेणियाँ हैं।

Q3: उप-मानक और संदिग्ध संपत्ति में क्या अंतर है?

A: उप-मानक संपत्ति 12 महीने से कम समय से एनपीए है, जबकि संदिग्ध संपत्ति 12 महीने से अधिक समय से एनपीए है और भुगतान की संभावना संदिग्ध है।

Q4: प्रावधान और संचय (प्रोविजन एंड कॉन्टिन्जेंसी) में क्या अंतर है?

A: प्रावधान ज्ञात देनदारियों या संपत्ति हानि के लिए बनाया जाता है, जबकि संचय संभावित लेकिन अनिश्चित देनदारियों के लिए बनाया जाता है।

Q5: एनपीए प्रावधान कैसे गणना किया जाता है?

A: एनपीए प्रावधान = बकाया राशि × प्रावधान दर (%)। दर संपत्ति वर्ग (उप-मानक, संदिग्ध, हानि) और सुरक्षा स्तर पर निर्भर करती है।

Q6: क्या सभी बैंकों के लिए प्रावधान दर समान है?

A: हाँ, RBI सभी अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के लिए एकसमान प्रावधान मानदंड निर्धारित करता है।

Q7: संपार्श्विक के बिना ऋण के लिए प्रावधान दर क्या है?

A: उप-मानक संपत्ति के लिए असुरक्षित ऋण पर 10% प्रावधान लागू होता है।

Q8: एनपीए प्रावधान कर पर कैसे प्रभाव डालता है?

A: आयकर अधिनियम के तहत, एनपीए पर प्रावधान कर-कटौती योग्य व्यय है, जब तक कि यह RBI दिशानिर्देशों के अनुसार बनाया गया हो।

Q9: क्या बैंक एनपीए को मानक संपत्ति में वापस बदल सकते हैं?

A: हाँ, यदि उधारकर्ता नियमित रूप से 12 महीने तक भुगतान करता है, तो एनपीए को मानक संपत्ति में पुनर्वर्गीकृत किया जा सकता है।

Q10: COVID-19 महामारी ने एनपीए मानदंडों को कैसे प्रभावित किया?

A: RBI ने महामारी के दौरान विशेष राहत प्रदान की, जिसमें मोरेटोरियम और संशोधित एनपीए मान्यता शामिल थी, लेकिन अधिकांश रियायतें अब समाप्त हो चुकी हैं।

Q11: एनपीए वसूली के लिए कौन से कानूनी उपाय उपलब्ध हैं?

A: मुख्य कानूनी उपायों में SARFAESI अधिनियम, 2002; दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016; और ऋण वसूली ट्रिब्यूनल (DRT) शामिल हैं।

Q12: क्या एनपीए का प्रावधान बनाने के बाद भी वसूली का प्रयास जारी रखा जाता है?

A: हाँ, 100% प्रावधान बनाने के बाद भी बैंक वसूली के प्रयास जारी रखते हैं, क्योंकि वसूली प्रावधान निधि में वापस जाती है।

Q13: एनपीए प्रबंधन में तकनीकी की क्या भूमिका है?

A: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और डेटा एनालिटिक्स एनपीए पूर्वानुमान, प्रारंभिक चेतावनी और वसूली अनुकूलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

Q14: भारत में वर्तमान एनपीए स्थिति क्या है?

A: मार्च 2023 तक, भारतीय बैंकिंग प्रणाली का सकल एनपीए अनुपात घटकर लगभग 3.9% रह गया है, जो ऐतिहासिक रूप से कम स्तर है, जो विभिन्न सुधार उपायों का प्रतिफल है।

Q15: एनपीए कम करने के लिए सरकार ने कौन-सी पहल की हैं?

A: प्रमुख पहलों में दिवाला और दिवालियापन संहिता, 2016; इंशॉल्वेंसी रिज़ॉल्यूशन फ्रेमवर्क; और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का पुनर्पूंजीकरण शामिल हैं

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