गौड़ीय सम्प्रदाय

भक्ति आंदोलन के एक ऐसे सम्प्रदाय के बारे में जिसने पूर्वी भारत से उत्पन्न होकर पूरे देश में अपनी छाप छोड़ी – गौड़ीय सम्प्रदाय। यह सम्प्रदाय अपनी भावुक कृष्ण भक्ति और कीर्तन परंपरा के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय

गौड़ीय सम्प्रदाय 16वीं शताब्दी में बंगाल में उत्पन्न एक प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय है। इस संप्रदाय का प्रारंभ बंगाल में हुआ और यह शीघ्र ही पूरे भारत में फैल गया। यह सम्प्रदाय कीर्तन और संकीर्तन के माध्यम से भक्ति पर विशेष बल देता है और कृष्ण-राधा की भावुक भक्ति के लिए प्रसिद्ध है।

सम्प्रदाय

गौड़ीय सम्प्रदाय एक ऐसा भक्ति मार्ग है जो ‘अचिन्त्य-भेदाभेद’ दर्शन में विश्वास रखता है। चैतन्य महाप्रभु ने ‘अचिन्त्य-भेदाभेद’ दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार जीव और ब्रह्म एक ही हैं और अलग भी हैं – यह अचिंत्य (अकल्पनीय) है। इस सम्प्रदाय में संकीर्तन और नाम संकीर्तन को विशेष महत्व दिया गया है।

प्रवर्तक

इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक चैतन्य महाप्रभु हैं। चैतन्य महाप्रभु एक महान संत, भक्त और दार्शनिक थे जिन्होंने अपनी भावुक भक्ति और कीर्तन परंपरा से लाखों लोगों को आकर्षित किया। उन्होंने भक्ति के मार्ग को सरल बनाया और सभी के लिए इसे सुलभ बनाया।

सगुण /निर्गुण

गौड़ीय सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय श्रीकृष्ण और राधा के सगुण रूप की उपासना पर विशेष बल देता है। इसके अनुयायी कृष्ण की बाल लीला और रास लीला का गायन करते हुए भक्ति में लीन रहते हैं।

प्रमुख पीठ/मंदिर

गौड़ीय सम्प्रदाय के प्रमुख पीठ हैं:

  • वृंदावन (उत्तर प्रदेश) – यह इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र है

  • गोविंद देव मंदिर (जयपुर) – राजस्थान में प्रमुख पीठ

ऐतिहासिक विकास:

  • महाराजा मानसिंह (आमेर) ने वृंदावन में गोविन्द देव जी का मंदिर का निर्माण करवाया था

  • औरंगजेब के शासनकाल में गोविन्द देव जी की मूर्ति वर्तमान कनक वृंदावन (पूर्व में गोविन्दपुरा) या पुराने गोविंद देव जी के मंदिर में स्थापित की गयी थी

  • 1772 ई. में सवाई जयसिंह ने गोविंद देव जी की प्रतिमा को सिटी पैलेस में ‘सूर्य महल’ में स्थापित किया

रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ

गौड़ीय सम्प्रदाय की समृद्ध साहित्यिक परंपरा है। इस सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रंथों में चैतन्य चरितामृत, चैतन्य भागवत, चैतन्य मंगल आदि शामिल हैं। इन ग्रंथों में चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं और लीलाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।

विशिष्ट तथ्य

गौड़ीय सम्प्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:

  1. दार्शनिक आधार: चैतन्य महाप्रभु ने ‘अचिन्त्य-भेदाभेद’ दर्शन का प्रतिपादन किया

  2. भौगोलिक उत्पत्ति: इस संप्रदाय का प्रारंभ बंगाल में हुआ

  3. संगीतमय भक्ति: कीर्तन और संकीर्तन को विशेष महत्व

  4. ऐतिहासिक संरक्षण: आमेर/जयपुर के शासकों द्वारा संरक्षण

  5. मूर्ति स्थापना: गोविंद देव जी की मूर्ति की स्थापना का इतिहास

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. गौड़ीय सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
गौड़ीय सम्प्रदाय के संस्थापक चैतन्य महाप्रभु हैं।

2. इस सम्प्रदाय का प्रारंभ कहाँ हुआ?
इस संप्रदाय का प्रारंभ बंगाल में हुआ।

3. गौड़ीय सम्प्रदाय का प्रमुख दर्शन क्या है?
चैतन्य महाप्रभु ने ‘अचिन्त्य-भेदाभेद’ दर्शन का प्रतिपादन किया।

4. राजस्थान में इस सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ कहाँ स्थित है?
राजस्थान में इस सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ गोविंद देव मंदिर (जयपुर) में स्थित है।

5. गोविंद देव जी के मंदिर का निर्माण किसने करवाया?
महाराजा मानसिंह (आमेर) ने वृंदावन में गोविन्द देव जी का मंदिर का निर्माण करवाया था।

6. गोविंद देव जी की मूर्ति को जयपुर में कब और कहाँ स्थापित किया गया?
1772 ई. में सवाई जयसिंह ने गोविंद देव जी की प्रतिमा को सिटी पैलेस में ‘सूर्य महल’ में स्थापित किया।

निष्कर्ष

गौड़ीय सम्प्रदाय भारतीय वैष्णव परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसने अचिन्त्य-भेदाभेद दर्शन और संकीर्तन परंपरा के माध्यम से भक्ति जगत को समृद्ध किया। चैतन्य महाप्रभु की भावुक भक्ति ने इस सम्प्रदाय को विशेष पहचान दी। राजस्थान में गोविंद देव मंदिर इस सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र बना और आमेर/जयपुर के शासकों ने इसके संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंदिरों के स्थापना और मूर्ति स्थापना का इतिहास इसकी ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। गौड़ीय सम्प्रदाय की यह अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत आज भी लाखों भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बनी हुई है।

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