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18वीं शताब्दी के एक ऐसे महान भक्ति आंदोलन के बारे में जिसने उत्तर भारत की आध्यात्मिक भूमि को गहराई से प्रभावित किया – चरणदासी सम्प्रदाय। यह सम्प्रदाय न केवल धार्मिक पुनर्जागरण का प्रतीक था, बल्कि सामाजिक समानता और नारी शिक्षा का एक क्रांतिकारी आंदोलन भी था।
प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय
चरणदासी सम्प्रदाय 18वीं शताब्दी में उत्पन्न एक प्रमुख भक्ति आंदोलन था, जिसकी स्थापना संत चरणदास जी ने की थी। यह सम्प्रदाय मुख्य रूप से दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में फैला हुआ था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने समाज के सभी वर्गों, विशेष रूप से महिलाओं और वंचित वर्गों के लोगों को आध्यात्मिक और सामाजिक मुक्ति का मार्ग दिखाया। यह सम्प्रदाय केवल एक पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं था, बल्कि जीवन जीने का एक संपूर्ण दर्शन प्रस्तुत करता था, जिसने सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर मानव मात्र की समानता का संदेश दिया।
सम्प्रदाय
चरणदासी सम्प्रदाय मूलतः एक ऐसा आध्यात्मिक मार्ग था जो जाति-पाति, ऊँच-नीच के सभी भेदभावों से ऊपर उठकर सभी मनुष्यों की मौलिक समानता में विश्वास रखता था। संत चरणदास जी ने इस सम्प्रदाय के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं और भक्ति का मार्ग सभी के लिए खुला है। इस सम्प्रदाय की स्थापना एक ऐसे युग में हुई जब सामाजिक विषमताएं चरम पर थीं और निम्न जातियों तथा महिलाओं के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता था। चरणदासी सम्प्रदाय ने इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और सभी वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाने का कार्य किया।
प्रवर्तक
इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक संत चरणदास जी थे, जिनका जन्म 1703 ईस्वी में हुआ था। उनके जीवन और शिक्षाओं ने न केवल एक नए आध्यात्मिक मार्ग का सूत्रपात किया, बल्कि सामाजिक क्रांति की भी नींव रखी। संत चरणदास जी का जन्म एक ऐसे समय में हुआ था जब भारतीय समाज कठोर जाति व्यवस्था और सामाजिक रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षाओं के माध्यम से समाज के उत्पीड़ित वर्गों, विशेषकर महिलाओं को न केवल आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक गरिमा भी प्रदान की। उनकी शिक्षाएँ सीधी-साधी और जनसामान्य की भाषा में थीं, जिसके कारण आम जनता आसानी से उनसे जुड़ सकी।
सगुण /निर्गुण
चरणदासी सम्प्रदाय में सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार की भक्ति का समन्वय देखने को मिलता है। यह सम्प्रदाय ईश्वर के सगुण रूप विशेष रूप से कृष्ण भक्ति के साथ-साथ निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर भी बल देता है। इस द्वैत दर्शन ने चरणदासी सम्प्रदाय को तत्कालीन अन्य many सम्प्रदायों से अलग करती है। संत चरणदास जी ने ईश्वर की प्राप्ति के लिए सगुण और निर्गुण दोनों मार्गों को समान रूप से महत्वपूर्ण माना, जिससे यह सम्प्रदाय सभी प्रकार के भक्तों के लिए सुलभ हो सका।
प्रमुख पीठ/मंदिर
चरणदासी सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र दिल्ली में स्थित था, जहाँ संत चरणदास जी ने अपनी शिक्षाओं का प्रसार किया। उनकी समाधि डेहरा ग्राम (अलवर) में स्थित है, जो इस सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है। डेहरा ग्राम में स्थित यह समाधि स्थल सैकड़ों वर्षों से इस सम्प्रदाय की परंपराओं और शिक्षाओं का संरक्षण कर रहा है और यहाँ प्रतिवर्ष हज़ारों श्रद्धालु आध्यात्मिक शांति और मार्गदर्शन की तलाश में आते हैं।
रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ
संत चरणदास जी और उनके शिष्यों द्वारा रचित ग्रंथ इस सम्प्रदाय की आध्यात्मिक और साहित्यिक समृद्धि के प्रमाण हैं:
चरणदास जी कृत:
ब्रजचरित
अमरलोक अखंड धाम वर्णन
धर्म जहाज वर्णन
अष्टांग योग
योग ज्ञान स्वरोदय
संदेह सागर
पंच उपनिषद
भक्ति सागर पदारथ
मन-विकृत करण गुटका सार
ब्रह्म-ज्ञान सागर
शिष्यों की रचनाएँ:
सहजोबाई ने सहज प्रकाश, सोलह तिथि निर्णय, सातवार निर्णय की रचना की। दयाबाई ने ‘दयाबोध’ व ‘विनय मालिका’ ग्रंथों की रचना की। ये रचनाएँ इस सम्प्रदाय की बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
विशिष्ट तथ्य
चरणदासी सम्प्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:
प्रमुख शिष्य: डंडोतीराम, आत्माराम, अखैराम, जोगजीत, गुरु छौना, सहजोबाई, दयाबाई, नूपीबाई, सहजानंद एवं अन्य।
महिला शिष्यों का विशेष योगदान: इस सम्प्रदाय की सबसे उल्लेखनीय विशेषता महिला शिष्यों का outstanding योगदान था। सहजोबाई और दयाबाई जैसी महिला संतों ने न केवल आध्यात्मिक साधना में बल्कि साहित्यिक रचनाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
सामाजिक समानता: इस सम्प्रदाय में सभी जातियों और वर्गों के लोगों का स्वागत था और सभी को समान अधिकार प्रदान किए गए थे।
शिक्षा का प्रसार: चरणदासी सम्प्रदाय ने नारी शिक्षा और उन्नति पर विशेष बल दिया। संत चरणदास जी ने महिलाओं को भी आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की और उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास किया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. चरणदासी सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
चरणदासी सम्प्रदाय के संस्थापक संत चरणदास जी हैं, जिनका जन्म 1703 ईस्वी में हुआ था।
2. यह सम्प्रदाय सगुण उपासना में विश्वास रखता है या निर्गुण?
चरणदासी सम्प्रदाय में सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार की भक्ति का समन्वय देखने को मिलता है।
3. इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र कहाँ स्थित है?
इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र दिल्ली में था और संत चरणदास जी की समाधि डेहरा ग्राम (अलवर) में स्थित है।
4. संत चरणदास जी की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
प्रमुख रचनाओं में ब्रजचरित, अमरलोक अखंड धाम वर्णन, धर्म जहाज वर्णन, अष्टांग योग, ब्रह्म-ज्ञान सागर आदि शामिल हैं।
5. इस सम्प्रदाय की सबसे उल्लेखनीय विशेषता क्या है?
इस सम्प्रदाय की सबसे उल्लेखनीय विशेषता महिला शिष्यों का outstanding योगदान है, जिन्होंने आध्यात्मिक और साहित्यिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किए।
निष्कर्ष
चरणदासी सम्प्रदाय भारतीय भक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसने सामाजिक समानता और भक्ति का संदेश फैलाया। संत चरणदास जी की शिक्षाएँ और उनके शिष्यों का योगदान आज भी इस क्षेत्र की धार्मिक-सामाजिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। इस सम्प्रदाय ने न केवल आध्यात्मिक जगत में बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रयास किया। आज भी, सैकड़ों वर्षों बाद, चरणदासी सम्प्रदाय अपने अनुयायियों के बीच जीवित है और संत चरणदास जी के संदेश लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं।