भारत के एक ऐसे रहस्यमयी और दार्शनिक सम्प्रदाय के बारे में जिसने हिन्दू-इस्लामिक एकता का अनूठा संगम प्रस्तुत किया – परनामी संप्रदाय/निजानंद संप्रदाय। यह सम्प्रदाय अपने गहन दार्शनिक चिंतन और सर्वधर्म समभाव के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय
परनामी संप्रदाय, जिसे निजानंद संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है, 17वीं शताब्दी में उत्पन्न एक प्रमुख भक्ति सम्प्रदाय है। इसकी स्थापना प्राणनाथ/देवचन्द्र जी महाराज ने की थी। यह सम्प्रदाय मुख्य रूप से मध्य प्रदेश और राजस्थान में फैला हुआ है और निर्गुण भक्ति पर बल देता है। इनके आराध्य देव कृष्ण हैं जिन्हें प्रणाम करना इस संप्रदाय का मूल दर्शन है।
सम्प्रदाय
परनामी संप्रदाय एक ऐसा दार्शनिक और आध्यात्मिक मार्ग है जो सर्वधर्म समभाव में विश्वास रखता है। इस सम्प्रदाय में हिन्दू और इस्लामिक दर्शन का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। संप्रदाय का नाम ‘परनामी’ यानी ‘प्रणाम करने वाला’ इसके मूल दर्शन को दर्शाता है – जिन्हें प्रणाम करना इस संप्रदाय का मूल दर्शन है।
प्रवर्तक
इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक प्राणनाथ/देवचन्द्र जी महाराज हैं। प्राणनाथ जी एक महान दार्शनिक, संत और समाज सुधारक थे जिन्होंने हिन्दू और इस्लामिक spiritual traditions का समन्वय करके एक universal धार्मिक दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘कुलजम स्वरूप’ या ‘तारात्म्य सागर’ नामक ग्रंथ की रचना की।
सगुण /निर्गुण
परनामी सम्प्रदाय निर्गुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय ईश्वर के निराकार, निर्विशेष और सर्वव्यापी स्वरूप की उपासना पर बल देता है। हालाँकि इनके आराध्य देव कृष्ण हैं, परंतु उनके निर्गुण स्वरूप की ही उपासना की जाती है।
प्रमुख पीठ/मंदिर
परनामी संप्रदाय के प्रमुख पीठ हैं:
प्रमुख गद्दी-पन्ना (मध्य प्रदेश)
राजस्थान में-जयपुर
ये दोनों स्थान इस सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण केंद्र हैं जहाँ से इसकी spiritual activities का संचालन होता है।
रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ
परनामी संप्रदाय की समृद्ध साहित्यिक परंपरा है:
प्राणनाथ जी कृत:
कुलजम स्वरूप/तारात्म्य सागर – यह इस सम्प्रदाय का मूल ग्रंथ है
दीन कृष्णभिखारी कृत:
निजानंद सागर
विशिष्ट तथ्य
परनामी संप्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:
आराध्य देव: इनके आराध्य देव कृष्ण हैं जिन्हें प्रणाम करना इस संप्रदाय का मूल दर्शन है
दार्शनिक आधार: हिन्दू-इस्लामिक दर्शन का समन्वय
उपासना पद्धति: निर्गुण भक्ति पर बल
प्रमुख केंद्र: पन्ना (म.प्र.) और जयपुर (राजस्थान)
साहित्यिक विरासत: कुलजम स्वरूप/तारात्म्य सागर और निजानंद सागर जैसे ग्रंथ
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. परनामी संप्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
परनामी संप्रदाय के संस्थापक प्राणनाथ/देवचन्द्र जी महाराज हैं।
2. इस सम्प्रदाय का दूसरा नाम क्या है?
इस सम्प्रदाय को निजानंद संप्रदाय के नाम से भी जाना जाता है।
3. परनामी संप्रदाय के आराध्य देव कौन हैं?
इनके आराध्य देव कृष्ण हैं जिन्हें प्रणाम करना इस संप्रदाय का मूल दर्शन है।
4. इस सम्प्रदाय के प्रमुख पीठ कहाँ स्थित हैं?
इस सम्प्रदाय के प्रमुख पीठ पन्ना (मध्य प्रदेश) और जयपुर (राजस्थान) में स्थित हैं।
5. प्राणनाथ जी की प्रमुख रचना कौन-सी है?
प्राणनाथ जी की प्रमुख रचना ‘कुलजम स्वरूप/तारात्म्य सागर’ है।
6. यह सम्प्रदाय सगुण उपासना में विश्वास रखता है या निर्गुण?
परनामी सम्प्रदाय निर्गुण भक्ति में विश्वास रखता है।
निष्कर्ष
परनामी संप्रदाय भारतीय भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसने हिन्दू-इस्लामिक एकता और निर्गुण भक्ति का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। प्राणनाथ जी के दार्शनिक विचारों ने इस सम्प्रदाय को एक विशेष पहचान दी। कृष्ण को आराध्य देव मानना और उन्हें प्रणाम करना इस संप्रदाय का मूल दर्शन बना। पन्ना और जयपुर स्थित मुख्य केंद्रों से यह सम्प्रदाय फला-फूला और ‘कुलजम स्वरूप’ व ‘निजानंद सागर’ जैसे ग्रंथों ने इसकी साहित्यिक विरासत को समृद्ध किया। परनामी सम्प्रदाय की यह सर्वधर्म समभाव की भावना और गहन दार्शनिक चिंतन आज भी अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य कर रही है।