भारतीय बैंकिंग ढांचा: परिचय

भारतीय बैंकिंग प्रणाली विश्व की सबसे जटिल, बहुस्तरीय और गतिशील वित्तीय ढांचों में से एक है, जो एक अरब से अधिक जनसंख्या की विविध आवश्यकताओं को पूरा करते हुए देश के आर्थिक विकास की रीढ़ की हड्डी के रूप में कार्य करती है। यह प्रणाली न केवल वित्तीय मध्यस्थता का कार्य करती है बल्कि देश की मौद्रिक नीति क्रियान्वयन, वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने और आर्थिक संवृद्धि को गति प्रदान करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

भारत में आधुनिक बैंकिंग की नींव 18वीं शताब्दी के अंत में रखी गई, जब 1770 में बैंक ऑफ हिंदुस्तान की स्थापना की गई। इसके बाद 1806 में बैंक ऑफ कलकत्ता (बाद में बैंक ऑफ बंगाल) की स्थापना ने प्रेसीडेंसी बैंकों के युग की शुरुआत की। वास्तविक संरचनात्मक आधार 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना के साथ पड़ा, जिसे देश की केन्द्रीय बैंकिंग संस्था के रूप में अधिकृत किया गया।

स्वतंत्रता के पश्चात, 1949 में बैंकिंग विनियमन अधिनियम पारित किया गया, जिसने RBI को व्यापक नियामक शक्तियाँ प्रदान कीं। भारतीय बैंकिंग इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ 19 जुलाई 1969 को आया, जब 14 प्रमुख व्यावसायिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इसके बाद 1980 में 6 और बैंकों के राष्ट्रीयकरण ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के वर्चस्व को स्थापित किया।

1991 के आर्थिक सुधारों ने बैंकिंग क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया। नरसिम्हम समिति की सिफारिशों के आधार पर उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों को अपनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप नए निजी बैंकों की स्थापना, विदेशी बैंकों की बढ़ती उपस्थिति और बैंकिंग कार्यप्रणाली में तकनीकी क्रांति का सूत्रपात हुआ।

वर्तमान भारतीय बैंकिंग ढांचा एक बहु-स्तरीय संरचना पर आधारित है, जिसमें विभिन्न प्रकार के बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान सम्मिलित हैं। शीर्ष पर भारतीय रिजर्व बैंक सर्वोच्च नियामक संस्था के रूप में कार्य करता है। इसके नीचे वाणिज्यिक बैंकों का व्यापक नेटवर्क है, जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, निजी क्षेत्र के बैंक, विदेशी बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और सहकारी बैंक शामिल हैं। इसके अतिरिक्त विकास वित्त संस्थान विशिष्ट क्षेत्रों में दीर्घकालिक वित्त प्रदान करते हैं, जबकि गैर-बैंकिंग वित्त कंपनियाँ (NBFCs) पूरक वित्तीय सेवाएँ उपलब्ध कराती हैं।

आधुनिक भारतीय बैंकिंग प्रणाली की प्रमुख विशेषताओं में व्यापक शाखा नेटवर्क (1.5 लाख से अधिक शाखाएँ), उन्नत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI, IMPS, NEFT, RTGS), मजबूत विनियामक ढांचा (BASEL III मानदंडों का अनुपालन), और व्यापक वित्तीय समावेशन पहल (प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत 50 करोड़ से अधिक खाते) शामिल हैं।

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र ने तकनीकी नवाचार के मामले में भी उल्लेखनीय प्रगति की है, जिसमें भारत की यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) विश्व की सबसे बड़ी रीयल-टाइम भुगतान प्रणाली बन गई है। साथ ही, साइबर सुरक्षा उपायोंडेटा संरक्षण मानदंडों और ग्राहक संरक्षण तंत्रों का लगातार उन्नयन किया जा रहा है।

हाल के वर्षों में बैंकिंग क्षेत्र ने बैंकों के रणनीतिक विलय (10 PSBs का 4 बैंकों में विलय), बैड बैंक की स्थापना (NARCL), और डिजिटल बैंकिंग इकाइयों (DBUs) के विस्तार जैसे महत्वपूर्ण परिवर्तन देखे हैं। इन सभी विकासों ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली को अधिक लचीला, पारदर्शी और कुशल बनाने में योगदान दिया है।

भारतीय बैंकिंग ढांचा इस समय पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक तकनीक के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है, जो वैश्विक मानकों के अनुरूप होते हुए भी स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है। यह ढांचा न केवल देश की आर्थिक प्रगति का प्रतिबिम्ब है बल्कि भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए निरंतर विकास और अनुकूलन की क्षमता भी रखता है।

भारतीय बैंकिंग ढाँचे से संबंधित अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

ऐतिहासिक विकास से संबंधित:

1. भारत का पहला बैंक कौन सा था और कब स्थापित हुआ?

भारत का पहला बैंक बैंक ऑफ हिंदुस्तान था, जिसकी स्थापना 1770 में कोलकाता में हुई थी। यह एक निजी बैंक था जो 1832 में विसर्जित हो गया।

2. प्रेसीडेंसी बैंक क्या थे?

प्रेसीडेंसी बैंक ब्रिटिश शासनकाल में स्थापित तीन बैंक थे:

  1. बैंक ऑफ बंगाल (1806 में बैंक ऑफ कलकत्ता के रूप में स्थापित)

  2. बैंक ऑफ बॉम्बे (1840 में स्थापित)

  3. बैंक ऑफ मद्रास (1843 में स्थापित)

ये तीनों बैंक 1921 में विलय होकर इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया बने, जो बाद में 1955 में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) में परिवर्तित हो गया।

3. RBI की स्थापना कब और क्यों हुई?

RBI की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट, 1934 के तहत हुई। स्थापना के प्रमुख कारण थे:

  • मुद्रा जारी करने को केंद्रीकृत करना

  • देश के विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन करना

  • बैंकिंग प्रणाली को विनियमित करना

  • सरकार के बैंकर के रूप में कार्य करना

4. बैंकों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया कब शुरू हुई?

बैंकों के राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया दो चरणों में हुई:

  1. पहला चरण (19 जुलाई 1969): 14 प्रमुख बैंकों का राष्ट्रीयकरण

  2. दूसरा चरण (15 अप्रैल 1980): 6 और बैंकों का राष्ट्रीयकरण

कुल 20 बैंक राष्ट्रीयकृत किए गए, लेकिन बाद में विलयों के कारण यह संख्या घटकर 12 रह गई है।

संरचनात्मक प्रश्न:

5. भारतीय बैंकिंग प्रणाली के स्तर कौन से हैं?

  1. शीर्ष स्तर: भारतीय रिजर्व बैंक (केंद्रीय बैंक)

  2. द्वितीय स्तर: वाणिज्यिक बैंक

    • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक

    • निजी क्षेत्र के बैंक

    • विदेशी बैंक

    • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक

  3. तृतीय स्तर: सहकारी बैंक

  4. चतुर्थ स्तर: विकास वित्त संस्थान और NBFCs

6. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों में क्या अंतर है?

 
 
पैरामीटरसार्वजनिक क्षेत्र के बैंकनिजी क्षेत्र के बैंक
स्वामित्वसरकार (50% से अधिक हिस्सेदारी)निजी संस्थाएँ/व्यक्ति
संख्या1221 (पुराने) + नए निजी बैंक
उद्देश्यसामाजिक और आर्थिकलाभ कमाना
निर्णय लेने की गतिअपेक्षाकृत धीमीतेज
शाखा नेटवर्कविस्तृतमुख्यतः शहरी क्षेत्र

7. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRBs) क्या हैं?

RRBs की स्थापना 1975 में हुई थी। उनकी विशेषताएँ:

  • संयुक्त स्वामित्व: केंद्र सरकार (50%), राज्य सरकार (15%), प्रायोजक बैंक (35%)

  • उद्देश्य: ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सुविधाएँ प्रदान करना

  • कार्यक्षेत्र: एक या अधिक जिले

  • वर्तमान में: 43 RRBs कार्यरत हैं

8. सहकारी बैंक कितने प्रकार के होते हैं?

  1. शहरी सहकारी बैंक (UCBs): शहरी क्षेत्रों में कार्य

  2. राज्य सहकारी बैंक (StCBs): राज्य स्तर पर

  3. जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCBs): जिला स्तर पर

  4. प्राथमिक कृषि ऋण सहकारी समितियाँ (PACS): गाँव स्तर पर

तकनीकी और डिजिटल प्रश्न:

9. UPI क्या है और यह कैसे काम करता है?

UPI (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) NPCI द्वारा विकसित एक रीयल-टाइम भुगतान प्रणाली है।

विशेषताएँ:

  • 24×7 काम करता है

  • तत्काल फंड ट्रांसफर

  • वर्चुअल पेमेंट एड्रेस (VPA) का उपयोग

  • एक ही मोबाइल ऐप से कई बैंक खाते जोड़ सकते हैं

सीमाएँ:

  • प्रति लेनदेन: ₹1 लाख (व्यक्तिगत), ₹2 लाख (व्यवसाय)

  • प्रति दिन: ₹1 लाख

10. डिजिटल बैंकिंग इकाइयाँ (DBUs) क्या हैं?

DBUs बैंकों की विशेष शाखाएँ हैं जो पूरी तरह डिजिटल सेवाएँ प्रदान करती हैं।

लाभ:

  • डिजिटल साक्षरता बढ़ाना

  • कागज रहित लेनदेन

  • 24×7 सेवाएँ

  • तेज और कुशल सेवा

सरकार का लक्ष्य: 75 DBUs स्थापित करना

सांख्यिकीय और वर्तमान स्थिति संबंधी:

11. वर्तमान में भारत में कितने बैंक हैं?

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक: 12

  • निजी क्षेत्र के बैंक: 21 (पुराने) + नए निजी बैंक

  • विदेशी बैंक: 46

  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक: 43

  • छोटे वित्त बैंक: 10

  • भुगतान बैंक: 6

12. बैंकों के विलय का क्या उद्देश्य था?

2017-2020 में हुए विलयों के उद्देश्य:

  1. वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए बड़े बैंक बनाना

  2. परिचालन लागत कम करना

  3. पूँजी आवश्यकताओं का बेहतर प्रबंधन

  4. NPA समस्या से निपटना

प्रमुख विलय:

  • 10 PSBs का 4 बैंकों में विलय (2020)

  • SBI का 5 सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक के साथ विलय (2017)

13. NARCL (बैड बैंक) क्या है?

नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (NARCL) एक बैड बैंक है जिसकी स्थापना 2021 में हुई।

उद्देश्य:

  • बैंकों की तनावग्रस्त आस्तियों (NPAs) को खरीदना

  • ऋण वसूली में सहायता करना

  • बैंकों की बैलेंस शीट साफ करना

कार्यप्रणाली:

  • सरकार द्वारा 100% गारंटी

  • बैंकों से NPAs खरीदना

  • विशेषज्ञों द्वारा वसूली का प्रयास

भविष्य और चुनौतियाँ:

14. भारतीय बैंकिंग क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?

  1. NPAs (गैर-निष्पादित आस्तियाँ): विशेषकर PSBs में

  2. साइबर सुरक्षा: डिजिटल बैंकिंग के साथ बढ़ते खतरे

  3. वित्तीय समावेशन: दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुँच

  4. तकनीकी निवेश: पुराने सिस्टम को आधुनिक बनाना

  5. प्रतिस्पर्धा: बैंकों, NBFCs और फिनटेक कंपनियों के बीच

15. भविष्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ क्या हैं?

  1. डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन: AI, ब्लॉकचेन, डेटा एनालिटिक्स

  2. ओपन बैंकिंग: API आधारित सेवाएँ

  3. ग्रीन बैंकिंग: पर्यावरण अनुकूल वित्त

  4. नेशनल डिजिटल बैंक: पूर्ण डिजिटल बैंक की संभावना

  5. एकीकृत भुगतान प्रणालियाँ: UPI के और विस्तार

16. भारतीय बैंकिंग की वैश्विक स्थिति क्या है?

  • UPI: विश्व की सबसे बड़ी रीयल-टाइम भुगतान प्रणाली

  • बैंकिंग घनत्व: बढ़ रहा है (प्रति लाख वयस्क 14.7 शाखाएँ)

  • वित्तीय समावेशन: जन धन योजना के तहत 50 करोड़ से अधिक खाते

  • रैंकिंग: कई भारतीय बैंक वैश्विक 500 में शामिल

17. RBI के BASEL III मानदंड क्या हैं?

BASEL III अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग नियम हैं जो पूँजी पर्याप्तता सुनिश्चित करते हैं।

भारत में लागू मानदंड:

  • कॉमन इक्विटी टियर 1: 5.5%

  • कुल पूँजी पर्याप्तता अनुपात: 9%

  • संरक्षण बफर: 2.5%

  • प्रति-चक्रीय बफर: 0-2.5%

लागू होने की तिथि: 31 मार्च 2019 से पूरी तरह लागू

ग्राहक संबंधित प्रश्न:

18. सामान्य ग्राहक के लिए बैंकिंग में हुए प्रमुख बदलाव क्या हैं?

  1. डिजिटल सेवाएँ: मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग

  2. भुगतान विकल्प: UPI, वॉलेट, कार्ड

  3. ग्राहक सुरक्षा: बीमा, धोखाधड़ी सुरक्षा

  4. शुल्क पारदर्शिता: RBI द्वारा शुल्क नियमन

  5. शिकायत निवारण: बैंकिंग लोकपाल, ऑनलाइन पोर्टल

19. आने वाले वर्षों में बैंकिंग कैसी होगी?

  1. पूर्ण डिजिटलीकरण: कम शाखाएँ, अधिक डिजिटल

  2. व्यक्तिगतकृत सेवाएँ: AI द्वारा ग्राहक की आवश्यकताओं के अनुसार

  3. ब्लॉकचेन आधारित लेनदेन: सुरक्षित और पारदर्शी

  4. वॉयस बैंकिंग: आवाज के माध्यम से लेनदेन

  5. एकीकृत वित्तीय सेवाएँ: बैंकिंग, बीमा, निवेश एक साथ

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