कृष्ण पक्ष
चतुर्थी – तिल चतुर्थी (संकट हरण चतुर्थी)
मेला: चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर)
तिल से बने व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
संकट दूर करने हेतु गणेश पूजन।
एकादशी – षट्तिला एकादशी
6 प्रकार के तिल (तिल का तेल, तिल के लड्डू आदि) का उपयोग कर पूजा।
पितृदोष शांति के लिए विशेष महत्व।
अमावस्या – मौनी अमावस्या
कुंभ मेले का शाही स्नान (यदि कुंभ इसी माह में हो)।
मौन रहकर स्नान व दान का विधान।
शुक्ल पक्ष
प्रतिपदा (एकम) – गुप्त नवरात्र प्रारंभ
तांत्रिक साधनाओं हेतु शुभ माना जाता है।
पंचमी – वसंत पंचमी (सरस्वती जयंती)
शिक्षा एवं कला की देवी सरस्वती की पूजा।
गार्गी पुरस्कार: राजस्थान सरकार द्वारा महिला शिक्षाविदों को दिया जाने वाला सम्मान।
पीले रंग के वस्त्र धारण करने की परंपरा।
पूर्णिमा – बेणेश्वर मेला (नवाटापरा, डूंगरपुर)
“आदिवासियों का कुंभ” या “वागड़ का पुष्कर” कहलाता है।
संगम स्थल: माही + सोम + जाखम नदियों का मिलन।
विशेषताएँ:
खंडित शिवलिंग की पूजा की जाती है।
संत मावजी द्वारा स्थापित धाम।
जनक कुंवरी ने विष्णु मंदिर बनवाया।
अबै तया वजे ने लक्ष्मीनारायण मंदिर की स्थापना की।
भील आदिवासियों की सक्रिय भागीदारी।
राजस्थान से जुड़ी अनूठी परंपराएँ
माघी पूर्णिमा पर बेणेश्वर धाम में आदिवासी गमेडी नृत्य व लोकगीतों का आयोजन।
वसंत पंचमी पर जयपुर में पतंगबाज़ी का विशेष आनंद।
विशेष तथ्य
तिल चतुर्थी पर चूहों को भोग लगाने की परंपरा (गणेश जी के वाहन के रूप में)।
बेणेश्वर मेला राजस्थान का द्वितीय सबसे बड़ा आदिवासी समागम है (पहला बांसवाड़ा का होली मेला)।
माघ मास: आध्यात्मिक साधना और आदिवासी संस्कृति का अद्भुत संगम!