मामादेव: राजस्थान के वर्षा देवताBy rajasthanfactss / August 18, 2025 Table of Contents (लोक आस्था एवं पूजा पद्धति) मूल जानकारी प्रकृति: अनिर्मित देवता (मूर्ति/मंदिर नहीं) पूजा स्थल: गाँव के बाहर तोरण/खंभे के नीचे उपाधि: “वर्षा के देवता” (सूखे से बचाव हेतु) पूजा विधि एवं मान्यताएँ तोरण पूजा: लकड़ी/पत्थर के तोरण (मेहराब) को मामादेव का प्रतीक माना जाता है। इसे हल्दी-चावल से सजाकर पूजा जाता है। बलि प्रथा: वर्षा के लिए भैंस की बलि दी जाती है (कुछ क्षेत्रों में अब प्रतिकात्मक बलि)। बलि के बाद सामूहिक भोज (मांस भक्षण) की परंपरा। लोकगीत: “मामा री जल्दी, मेघा रा घन छायो!” (मामादेव से वर्षा की प्रार्थना)। सामाजिक-पारिस्थितिक महत्व कृषि आधारित आस्था: किसानों द्वारा अकाल के समय विशेष पूजा। विवादास्पद प्रथा: भैंस की बलि को लेकर आधुनिक समय में चर्चा। राजस्थान में प्रसार मुख्य क्षेत्र: शेखावाटी (झुंझुनू, सीकर) मेवाड़ (भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़) समान देवता: पाबूजी (मारवाड़ में वर्षा हेतु पूज्य)। तुलनात्मक विश्लेषण देवता पूजा स्थल उद्देश्य मामादेव तोरण (गाँव बाहर) वर्षा के लिए इंद्रदेव मंदिर वर्षा पाबूजी मंदिर/फड़ ऊँट/गौरक्षा मामादेव: किसानों की आस और प्रकृति के संवाद का प्रतीक!“मामा रा तोरण, मेघा रा द्वार!”(राजस्थानी कहावत: मामादेव का तोरण बादलों के द्वार खोलता है)। विशेष नोट: आधुनिक समय में कई गाँवों में प्रतीकात्मक बलि (नारियल, कद्दू) देने की प्रथा शुरू हुई है।