मामादेव: राजस्थान के वर्षा देवता

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(लोक आस्था एवं पूजा पद्धति)

मूल जानकारी

  • प्रकृति: अनिर्मित देवता (मूर्ति/मंदिर नहीं)

  • पूजा स्थल: गाँव के बाहर तोरण/खंभे के नीचे

  • उपाधि: “वर्षा के देवता” (सूखे से बचाव हेतु)

पूजा विधि एवं मान्यताएँ

  1. तोरण पूजा:

    • लकड़ी/पत्थर के तोरण (मेहराब) को मामादेव का प्रतीक माना जाता है।

    • इसे हल्दी-चावल से सजाकर पूजा जाता है।

  2. बलि प्रथा:

    • वर्षा के लिए भैंस की बलि दी जाती है (कुछ क्षेत्रों में अब प्रतिकात्मक बलि)।

    • बलि के बाद सामूहिक भोज (मांस भक्षण) की परंपरा।

  3. लोकगीत:

    • “मामा री जल्दी, मेघा रा घन छायो!” (मामादेव से वर्षा की प्रार्थना)।

सामाजिक-पारिस्थितिक महत्व

  • कृषि आधारित आस्था:

    • किसानों द्वारा अकाल के समय विशेष पूजा।

  • विवादास्पद प्रथा:

    • भैंस की बलि को लेकर आधुनिक समय में चर्चा।

राजस्थान में प्रसार

  • मुख्य क्षेत्र:

    • शेखावाटी (झुंझुनू, सीकर)

    • मेवाड़ (भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़)

  • समान देवता:

    • पाबूजी (मारवाड़ में वर्षा हेतु पूज्य)।

तुलनात्मक विश्लेषण

देवता पूजा स्थल उद्देश्य
मामादेव तोरण (गाँव बाहर) वर्षा के लिए
इंद्रदेव मंदिर वर्षा
पाबूजी मंदिर/फड़ ऊँट/गौरक्षा

मामादेव: किसानों की आस और प्रकृति के संवाद का प्रतीक!

“मामा रा तोरण, मेघा रा द्वार!”

(राजस्थानी कहावत: मामादेव का तोरण बादलों के द्वार खोलता है)।

विशेष नोट: आधुनिक समय में कई गाँवों में प्रतीकात्मक बलि (नारियल, कद्दू) देने की प्रथा शुरू हुई है।

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