रसिक सम्प्रदाय

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भक्ति साहित्य के एक ऐसे सम्प्रदाय की जिसने प्रेम और भक्ति की सरस धारा को समर्पित किया है – रसिक सम्प्रदाय। यह सम्प्रदाय भक्ति की रसिक परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है जो श्रीकृष्ण भक्ति में डूबी हुई है।

प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय

रसिक सम्प्रदाय भारतीय भक्ति आंदोलन की एक सुसंस्कृत और साहित्यिक शाखा है। यह सम्प्रदाय मुख्य रूप से ब्रज क्षेत्र और राजस्थान में फैला हुआ है और भक्ति के साथ-साथ कला और साहित्य को भी विशेष महत्व देता है।

सम्प्रदाय

रसिक सम्प्रदाय एक ऐसी भक्ति धारा है जो भगवान और भक्त के बीच प्रेम के विभिन्न रसों को स्वीकार करती है। इस सम्प्रदाय में भक्ति को एक रसिक अनुभव के रूप में देखा जाता है जहाँ भक्त ईश्वर के साथ प्रेम के विविध रूपों में संबंध स्थापित करता है।

प्रवर्तक

इस रसमय सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामी अग्रदास जी हैं। उन्होंने इस सम्प्रदाय की स्थापना करके भक्ति के क्षेत्र में एक नई दिशा प्रदान की। स्वामी अग्रदास जी एक महान संत और विद्वान थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से इस सम्प्रदाय को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

सगुण /निर्गुण

रसिक सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय ईश्वर के सगुण रूप विशेष रूप से श्रीकृष्ण के बाल रूप और लीला रूप की उपासना पर बल देता है। इसके अनुयायी ईश्वर को साकार मानकर उनके विभिन्न रूपों की भक्ति में लीन रहते हैं।

प्रमुख पीठ/मंदिर

इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र रेवासा ग्राम (सीकर) में स्थित है। यह स्थान रसिक सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है और यहाँ का मंदिर इस सम्प्रदाय की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। रेवासा ग्राम में स्थित यह पीठ सैकड़ों वर्षों से इस सम्प्रदाय की परंपराओं और शिक्षाओं का संरक्षण कर रही है।

रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ

स्वामी अग्रदास जी द्वारा रचित ग्रंथ इस सम्प्रदाय की आध्यात्मिक और साहित्यिक समृद्धि के प्रमाण हैं:

  • रामध्यान मंजरी – यह ग्रंथ भगवान राम की भक्ति और ध्यान पर केंद्रित है।

  • ध्यान मंजरी – इसमें विभिन्न देवताओं के ध्यान और उपासना की विधियों का वर्णन है।

  • पदावली – यह भक्ति पदों का संग्रह है जो भक्ति रस से परिपूर्ण हैं।

  • कुंडलिया – इस रचना में कुंडलिया छंद में भक्ति भाव व्यक्त किए गए हैं।

  • पूजा उपासना – इसमें विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा और उपासना की विधियों का विस्तृत वर्णन है।

  • अष्टयाम – यह ग्रंथ दिन के आठ प्रहरों में की जाने वाली भक्ति साधना से संबंधित है।

  • विश्व ब्रह्म ज्ञान – इसमें ब्रह्म ज्ञान और विश्व ब्रह्मांड के रहस्यों पर प्रकाश डाला गया है।

विशिष्ट तथ्य

रसिक सम्प्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:

  • इस सम्प्रदाय में भक्ति को एक रसिक अनुभव के रूप में देखा जाता है।

  • यह सम्प्रदाय कला और साहित्य को भक्ति का महत्वपूर्ण माध्यम मानता है।

  • स्वामी अग्रदास जी की रचनाएँ इस सम्प्रदाय की मूल शिक्षाओं का आधार हैं।

  • इस सम्प्रदाय के अनुयायी भगवान के सगुण रूप की उपासना को विशेष महत्व देते हैं।

निष्कर्ष

रसिक सम्प्रदाय भारतीय भक्ति परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसने भक्ति को रसिक अनुभव के स्तर तक पहुँचाया। स्वामी अग्रदास जी के मार्गदर्शन में विकसित इस सम्प्रदाय ने साहित्य और कला के माध्यम से भक्ति की एक समृद्ध परंपरा का निर्माण किया। आज भी यह सम्प्रदाय अपने अनुयायियों के लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शन का कार्य कर रहा है और भक्ति की रसिक धारा को आगे बढ़ा रहा है।

रसिक सम्प्रदाय के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. रसिक सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
रसिक सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामी अग्रदास जी हैं, जिन्होंने इस भक्ति परंपरा की स्थापना की।

2. यह सम्प्रदाय सगुण उपासना में विश्वास रखता है या निर्गुण?
रसिक सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय ईश्वर के सगुण रूप विशेष रूप से श्रीकृष्ण के बाल रूप और लीला रूप की उपासना पर बल देता है।

3. इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र कहाँ स्थित है?
इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र रेवासा ग्राम (सीकर, राजस्थान) में स्थित है, जो अनुयायियों के लिए पवित्र तीर्थस्थल माना जाता है।

4. स्वामी अग्रदास जी की प्रमुख रचनाएँ कौन-सी हैं?
प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं:

  • रामध्यान मंजरी

  • ध्यान मंजरी

  • पदावली

  • कुंडलिया

  • पूजा उपासना

  • अष्टयाम

  • विश्व ब्रह्म ज्ञान

5. रसिक सम्प्रदाय की मुख्य विशेषता क्या है?
इस सम्प्रदाय की मुख्य विशेषता है कि यह भक्ति को एक रसिक अनुभव के रूप में देखता है, जहाँ भक्त ईश्वर के साथ प्रेम के विविध रसों में संबंध स्थापित करता है।

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