राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति एवं मृदाएँ

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प्राकृतिक वनस्पति: परिचय

‘वनस्पति’ से तात्पर्य वृक्षों, झाड़ियों, घासों, बेलों और लताओं आदि के समूह अथवा पौधों की विभिन्न प्रजातियों से है, जो एक निश्चित पर्यावरण में पाई जाती हैं। वनस्पति और वन में एक मूल अंतर यह है कि वन व्यापक रूप से संपूर्ण वनस्पतियों, वन्यजीवों एवं आस-पास के वातावरण को समाहित करता है। प्राकृतिक वनस्पति का प्रभाव मृदा, जलवायु जैसे प्राकृतिक तत्वों के साथ-साथ मानव एवं जंतुओं पर भी पड़ता है।

राजस्थान, क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य है, जहाँ केवल 9.59% भू-भाग पर वन क्षेत्र है। इस मामले में राज्य का देश में 15वाँ स्थान है। राज्य के उत्तरी-पश्चिमी भाग का 61% क्षेत्र मरुस्थलीय या अर्द्धमरुस्थलीय है, जबकि 30% क्षेत्र पर अरावली पर्वत श्रृंखलाएँ फैली हुई हैं, जो राज्य के मरुस्थलीय एवं गैर-मरुस्थलीय भागों को अलग करती है।


वैधानिक दृष्टि से वनों की स्थिति

राजस्थान वन अधिनियम 1953 के अंतर्गत अभिलेखित वन क्षेत्र 32,845.30 वर्ग किमी है, जिसे निम्नानुसार वर्गीकृत किया गया है:

 
 
क्र.सं.वैधानिक स्थितिक्षेत्रफल (वर्ग किमी.)प्रतिशत
1.आरक्षित वन12,252.2837.30%
2.रक्षित वन18,494.9756.31%
3.अवर्गीकृत वन2,098.056.39%
कुल योग 32,845.30100.00%

वानिकी परिदृश्य: एक दृष्टि में

  • अभिलेखित वन क्षेत्र: 32,845.30 वर्ग किमी (राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 9.59%)

  • वन आवरण: 16,630 वर्ग किमी (2019-20 वन रिपोर्ट)

  • कुल वनावरण एवं वृक्षावरण: 24,742 वर्ग किमी (राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 7.23%)

  • प्रति व्यक्ति वन एवं वृक्षावरण: 0.036 हेक्टेयर

  • राज्य का वृक्षावरण: 8,112 वर्ग किमी


वनों के प्रकार एवं विवरण

राजस्थान की वन संपदा को वनस्पतियों के आधार पर निम्न प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है:

 
 
क्र.सं.वनों के प्रकारकुल वन क्षेत्र का प्रतिशतविशेषताएँ एवं क्षेत्र
1.शुष्क सागवान वन5.63%क्षेत्र: झालावाड़, बारां, कोटा, बाँसवाड़ा, डूंगरपुर
वर्षा: 75-110 सेमी
प्रमुख वृक्ष: सागवान, तेंदू, खैर, बरगद, आम, महुआ, साल
उपयोग: भवन निर्माण व फर्नीचर
2.शुष्क उष्णकटिबंधीय टोंक वन0.21%
3.उत्तरी उष्णकटिबंधीय शुष्क पतझड़ी मिश्रित वन40.70%
4.उष्णकटिबंधीय काँटेदार वन10.96%
5.अर्द्ध-उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन0.02%
6.अन्य वन42.48%

मृदाएँ (मिट्टियाँ)

राजस्थान की मृदाओं में भी उतनी ही विविधता है, जितनी जलवायु और वनस्पति में। प्रमुख मृदा प्रकार हैं:

  1. रेतीली मृदा (मरुस्थलीय मिट्टी): पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, चूरू) में पाई जाती है। इसमें जैविक पदार्थों की कमी, जल धारण क्षमता कम।

  2. लाल-पीली मृदा: अलवर, भरतपुर, धौलपुर, सवाई माधोपुर के कुछ भागों में।

  3. काली मिट्टी (रेंगुर): कोटा, बूंदी, झालावाड़ के कुछ भागों में। कपास की खेती के लिए उपयुक्त।

  4. लाल लोमी मृदा: उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा के पहाड़ी क्षेत्रों में।

  5. जलोढ़ मिट्टी: श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर में। सर्वाधिक उपजाऊ, गेहूँ व गन्ने की खेती के लिए उत्तम।

  6. कंकरीली मिट्टी: अरावली के पर्वतीय व पठारी क्षेत्रों में। कृषि के लिए कम उपयोगी।


वनों एवं मृदाओं का महत्व

  • पारिस्थितिकी संतुलन: मृदा अपरदन रोकना, जलवायु नियंत्रण, वन्यजीव आवास।

  • आर्थिक महत्व: इमारती लकड़ी, औषधीय पौधे, रेशे, गोंद, लाख आदि के स्रोत।

  • कृषि आधार: विभिन्न मृदा प्रकार विभिन्न फसलों के अनुकूल हैं, जो राज्य की कृषि विविधता का आधार हैं।

  • सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व: आदिवासी समुदायों की आजीविका, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ाव।

चुनौतियाँ एवं संरक्षण

  • वन क्षेत्र में कमी, मरुस्थलीकरण का विस्तार।

  • मृदा अपरदन, लवणीकरण, जल भराव की समस्याएँ।

  • सरकार द्वारा वन संरक्षण अधिनियमसामाजिक वानिकीवाटरशेड प्रबंधन जैसे उपायों का क्रियान्वयन।

  • राजस्थान वनीकरण एवं वृक्षारोपण नीति के माध्यम से हरित आवरण बढ़ाने के प्रयास।

निष्कर्ष: राजस्थान की प्राकृतिक वनस्पति एवं मृदाएँ यहाँ की भौगोलिक विविधता के अनुरूप हैं। शुष्क काँटेदार वनों से लेकर सागवान के वन तक, और रेतीली मरुस्थलीय मिट्टी से लेकर उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी तक का यह विस्तार राज्य के प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि को दर्शाता है। इन संसाधनों का संरक्षण एवं सतत उपयोग राजस्थान के पर्यावरणीय एवं आर्थिक भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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