राजस्थान की भूगर्भिक संरचना: एक समय में सिमटी करोड़ों वर्षों की कहानी

राजस्थान को जब हम रेतीले मैदानों, ऊँटों और राजाओं की भूमि के रूप में याद करते हैं, तो अक्सर यह भूल जाते हैं कि इसकी धरती की नींव में करोड़ों वर्ष पुराना इतिहास दफन है। भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले यहाँ की भूगर्भिक संरचना बेहद विशिष्ट और विविधतापूर्ण है। एक ओर यहाँ दुनिया के सबसे पुराने पर्वत अरावली हैं, तो दूसरी ओर हवा द्वारा बिछाया गया ताजा रेत का आवरण। आइए, समय के पन्ने पलटते हुए इस अद्भुत भूवैज्ञानिक यात्रा पर नज़र डालते हैं।

एक नज़ारा: चार महाकल्पों का सफर

राजस्थान की धरती का निर्माण चार प्रमुख भूवैज्ञानिक महाकल्पों में हुआ है:

  1. आद्य महाकल्प (Proterozoic Era): सबसे प्राचीन, लगभग 425 करोड़ से 45 करोड़ वर्ष पुराना।

  2. पुराजीवी महाकल्प (Paleozoic Era)

  3. मध्यजीवी महाकल्प (Mesozoic Era)

  4. नवजीवी महाकल्प (Cenozoic Era): सबसे नवीन, लगभग 10 लाख वर्ष पुराना।

सबसे हैरानी की बात यह है कि यहाँ दुनिया के सबसे पुराने और सबसे नए चट्टानी संस्तर एक ही राज्य में मिलते हैं!


आद्य महाकल्प: धरती की प्राचीनतम गाथा का साक्षी

यह काल राजस्थान की पहचान, अरावली पर्वतमाला के जन्म का काल है। इसे दो भागों में बाँटा जाता है:

1. अरावली पूर्व काल (Pre-Aravali)

  • यह वह समय है जब बुंदेलखंड नीस जैसी अतिप्राचीन चट्टानें बनीं, जो आज चित्तौड़-भीलवाड़ा के बीच मिलती हैं।

  • इन्हें ‘भीलवाड़ा सुपर ग्रुप’ भी कहा जाता है। इनमें गुलाबी ग्रेनाइट पाया जाता है।

  • इसके बाद ही अरावली पर्वतमाला का उत्थान हुआ, जो आज दिल्ली से गुजरात तक एक विकर्ण के रूप में फैली हुई है। ये दुनिया के सबसे पुराने पर्वतों में से हैं और अब ‘अवशिष्ट पर्वत’ के रूप में बचे हुए हैं।

2. कैंब्रियन पूर्व काल (Pre-Cambrian)

इस काल में अरावली और उसके बाद की चट्टानें बनीं। इसे दो मुख्य समूहों में समझा जा सकता है:

  • अरावली महासमूह (Aravali Supergroup):

    • ये चट्टानें पट्टित नीस के ऊपर जमा हुईं। इनमें फायलाइट, डोलोमाइट, क्वार्टजाइट और संगुटिकाश्म चट्टानें शामिल हैं।

    • इसे आगे झाड़ोल समूह और उदयपुर समूह में बाँटा गया है।

    • जालौर-सिवाना की पहाड़ियाँ अरावली स्लेट से ही बनी हैं।

  • देहली महासमूह (Delhi Supergroup):

    • ये चट्टानें राजस्थान के एक बड़े हिस्से पर फैली हुई हैं।

    • इसमें तीन उप-समूह हैं:

      1. रायलो समूह: मुख्यतः चूने का पत्थर, क्वार्टजाइट, संगमरमर।

      2. अलवर समूह: अलवर के आसपास की पहाड़ियाँ इन्हीं से बनी हैं।

      3. अजबगढ़ समूह: इनमें एरिनपुरा ग्रेनाइट और जालौर-ग्रेनाइट जैसी आग्नेय चट्टानें शामिल हैं, जो गुंबदाकार पहाड़ियाँ बनाती हैं।


पुराजीवी महाकल्प: प्राचीन जीवन के संकेत

इस युग में विंध्यन महासमूह की शैलों का निर्माण हुआ, जो मुख्यतः पूर्वी राजस्थान में पाया जाता है।

  • विस्तार: यह धौलपुर-करौली से लेकर निम्बाहेड़ा, मुकंदरा हिल्स तक फैला है।

  • चट्टान प्रकार: इसमें कोंग्लोमेरेट, बलुआ पत्थर, शेल और चूने का पत्थर जैसी अवसादी चट्टानें मिलती हैं।

  • महत्वपूर्ण भू-घटना: इसी दौरान महान सीमा भ्रंश (Great Boundary Fault) का निर्माण हुआ, जो आज भी चंबल नदी के समानांतर लगभग 800 किमी लंबे क्षेत्र में देखा जा सकता है। इस भ्रंश के कारण नई चट्टानें (भंडेर शैल) पुरानी मुड़ी हुई अरावली शैलों के किनारों पर आ चढ़ी हैं।


निष्कर्ष

राजस्थान का भूगर्भिक मानचित्र एक जीवित पुस्तक की तरह है, जिसके हर पन्ने पर धरती के करोड़ों वर्ष के इतिहास की कहानी दर्ज है। यहाँ की विशिष्ट संरचना—जहाँ प्राचीनतम अरावली और नवीनतम रेत के टीलें साथ-साथ हैं—इसे भूवैज्ञानिकों के लिए एक अनोखा और आकर्षक क्षेत्र बनाती है। अगली बार जब आप राजस्थान के रेतीले लेकिन ठोस इतिहास पर कदम रखें, तो याद रखें कि आपका हर कदम एक प्रागैतिहासिक युग की यात्रा पर है।

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