राजस्थान राज्य का राज्य वृक्ष खेजड़ी

राजस्थान का राज्य वृक्ष: खेजड़ी

  • औपचारिक नाम: इसे 1983 में राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया था।

  • उपनाम: इसे “रेगिस्तान का गौरव” और “थार का कल्पवृक्ष” भी कहा जाता है।

  • वैज्ञानिक नाम: इसका वैज्ञानिक नाम प्रोसेसिपस सिनेरेरिया (Prosopis Cineraria) है।

विशेषताएँ और महत्व:

    • क्षेत्र: यह पश्चिमी एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क भागों का मूल निवासी है और ईरान, पाकिस्तान, सऊदी अरब आदि देशों में भी पाया जाता है।

    • सहनशीलता: यह अत्यधिक सूखा सहन करने में सक्षम है।

    • धार्मिक महत्व: विजयादशमी/दशहरे के दिन इसकी पूजा की जाती है।

    • स्थानीय नाम: इसे अलग-अलग क्षेत्रों और भाषाओं में अलग-अलग नामों से जाना जाता है, जैसे:

      • हरियाणवी/पंजाबी: जांटी

      • सिंधी: धोकड़ा

      • बिश्नोई समुदाय: शमी

      • तेलंगाना: जम्मी

      • पश्चिमी UP: छोंकारा

    • उत्पाद: इसकी हरी फलियों को सांगरी, सूखी फलियों को खोखा और पत्तियों से बने चारे को लुंग/लुम कहा जाता है।

राजस्थान में विशेष:

सर्वाधिक क्षेत्र: शेखावटी क्षेत्र में सर्वाधिक देखे जाते हैं।

      • सर्वाधिक घनत्व: नागौर जिले में सबसे अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

      • पुराने वृक्ष: अजमेर के मांगलियावास गाँव में 1000 वर्ष पुराने खेजड़ी के वृक्ष मिले हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इसकी आयु 5000 वर्ष तक हो सकती है।

      • धार्मिक स्थल: गोगाजी और झुंझार बाबा का थान/मंदिर अक्सर खेजड़ी के पेड़ के नीचे बनाया जाता है।

ऐतिहासिक घटना: खेजड़ली बलिदान

  • तिथि: भाद्रपद शुक्ल दशमी, सन् 1730।

  • स्थान: जोधपुर का खेजड़ली गाँव।

  • घटना: जोधपुर के तत्कालीन शासक अभय सिंह ने महल बनाने के लिए खेजड़ी के पेड़ काटने का आदेश दिया।

  • बलिदान: अमृता देवी बिश्नोई और उनकी तीन बेटियों सहित कुल 363 बिश्नोई समुदाय के लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसे ‘साका/खडाना’ कहा जाता है।

  • प्रभाव: यह घटना पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में एक मील का पत्थर है और 1970 के चिपको आंदोलन की प्रेरणा बनी।

सम्मान और पहल:

    • डाक टिकट: विश्व पर्यावरण दिवस (5 जून) 1988 को खेजड़ी पर 60 पैसे का डाक टिकट जारी किया गया।

    • अमृता देवी पुरस्कार: वन्यजीव संरक्षण के लिए दिया जाने वाला यह सर्वोच्च पुरस्कार है।

      • संस्था को 50,000 रुपये और व्यक्ति को 25,000 रुपये दिए जाते हैं।

      • पाली के गंगाराम बिश्नोई को यह पहला पुरस्कार मिला।

    • खेजड़ली दिवस: प्रतिवर्ष 12 सितंबर को यह दिवस मनाया जाता है। पहला दिवस 12 सितंबर 1978 को मनाया गया था।

    • ऑपरेशन खेजड़ी: 1991 में मरुस्थल के प्रसार को रोकने के लिए यह कार्यक्रम चलाया गया।

    • बोर्ड का नाम: राजस्थान सरकार ने ‘राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड’ का नाम बदलकर ‘अमृता देवी राज्य जीव-जंतु कल्याण बोर्ड’ कर दिया है।

औषधीय उपयोग:

खेजड़ी की पत्तियों को चबाने से मुंह के छालों और सूजन में आराम मिलता है (रस को निगला नहीं जाता)।

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