भारतीय भक्ति परंपरा के एक ऐसे समृद्ध सम्प्रदाय के बारे में जिसने शुद्धाद्वैत दर्शन और कृष्ण भक्ति की अनूठी परंपरा स्थापित की – वल्लभ सम्प्रदाय। यह सम्प्रदाय अपनी भव्य हवेलियों, जीवंत झाँकियों और कला-संस्कृति के संरक्षण के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय
वल्लभ सम्प्रदाय 16वीं शताब्दी में उत्पन्न एक प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय है जिसने शुद्धाद्वैत दर्शन और पुष्टिमार्ग की स्थापना की। यह सम्प्रदाय मुख्य रूप से ब्रज और राजस्थान क्षेत्र में फैला हुआ है और कृष्ण भक्ति की बाल लीला पर विशेष बल देता है। राजस्थान में इस सम्प्रदाय का विशेष महत्व है जहाँ नाथद्वारा इसका प्रमुख केंद्र बना।
सम्प्रदाय
वल्लभ सम्प्रदाय एक ऐसा दार्शनिक और आध्यात्मिक मार्ग है जो शुद्धाद्वैत दर्शन में विश्वास रखता है। इस सम्प्रदाय में पुष्टिमार्ग का प्रवर्तन किया गया, जो भगवान की कृपा से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है। इस संप्रदाय में मंदिर को हवेली और दर्शन को झाँकी कहा जाता है, जो इसकी अनूठी विशेषता है।
प्रवर्तक
इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक वल्लभाचार्य हैं, जिनका जन्म 1478/1479 ईस्वी में हुआ था। वल्लभाचार्य एक महान दार्शनिक, संत और भक्त थे जिन्होंने शुद्धाद्वैत नामक दर्शन का प्रतिपादन किया। उनके पुत्र विठ्ठलनाथ ने ‘अष्ट छाप कवि मंडल’ की स्थापना कर इस संप्रदाय को लोकप्रिय बनाया।
सगुण /निर्गुण
वल्लभ सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय श्रीकृष्ण के बाल रूप और लीला रूप की उपासना पर विशेष बल देता है। इसके अनुयायी ईश्वर के सगुण रूप की भक्ति को ही मोक्ष का साधन मानते हैं और पुष्टिमार्ग का अनुसरण करते हैं।
प्रमुख पीठ/मंदिर
वल्लभ सम्प्रदाय के राजस्थान में प्रमुख पीठ सिहाड़ गांव (नाथद्वारा) में स्थित है। इस सम्प्रदाय के प्रमुख मंदिर इस प्रकार हैं:
(i) श्रीनाथ जी मंदिर नाथद्वारा (राजसमंद):
मेवाड़ नरेश राजसिंह-I के समय 1671 ई. में श्रीनाथ जी की मूर्ति नवनीतप्रिय जी व विठ्ठलनाथ जी की मूर्तियों के साथ वर्तमान मंदिर नाथद्वारा (पूर्व में सिंहाड़ ग्राम) में स्थापित की गई।
(ii) द्वारकेश/द्वारकाधीश मंदिर- कांकरोली (राजसमंद):
मेवाड़ महाराजा राजसिंह-I के समय प्रथम बार द्वारकाधीश की मूर्ति को आसोटिया (कांकरोली) में 1670 ई. में व पुनः 1719 ई. में वर्तमान मंदिर में स्थापित किया गया।
(iii) मथुरेशजी (मथुराधीश जी)- कोटा:
राव दुर्जनशाल के समय 1744 ई. में द्वारकाधीश जी की हवेली में मथुराधीश जी की मूर्ति को स्थापित किया गया।
(iv) गोकुलचंद्र मंदिर- (कामवन)
(v) मदनमोहन मंदिर, करौली
(vi) बालकृष्ण मंदिर, सूरत (गुजरात)
(vii) गोकुलनाथ मंदिर गोकुल (उत्तर प्रदेश)
रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ
वल्लभ सम्प्रदाय की समृद्ध साहित्यिक परंपरा है:
वल्लभाचार्य कृत:
‘अनुभाष्य’
गोकुलनाथ कृत:
दो सौ बावन वैष्णव की वार्ता
विशिष्ट तथ्य
वल्लभ सम्प्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:
दार्शनिक आधार: वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत नामक दर्शन का प्रतिपादन किया
सांस्कृतिक योगदान: विठ्ठलनाथ ने ‘अष्ट छाप कवि मंडल’ की स्थापना कर इस संप्रदाय को लोकप्रिय बनाया
विशेष शब्दावली: इस संप्रदाय में मंदिर को हवेली, व दर्शन को झाँकी कहा जाता है
सांस्कृतिक उत्सव: नाथद्वारा का अन्नकूट महोत्सव प्रसिद्ध है
कलात्मक विरासत: ‘पिछवाई’ पेंटिंग इस सम्प्रदाय की विशेष कलात्मक विरासत है
ऐतिहासिक महत्व: विभिन्न मंदिरों की स्थापना मेवाड़ और कोटा के शासकों के समय में हुई
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. वल्लभ सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
वल्लभ सम्प्रदाय के संस्थापक वल्लभाचार्य हैं, जिनका जन्म 1478/1479 ईस्वी में हुआ था।
2. इस सम्प्रदाय का प्रमुख दर्शन क्या है?
वल्लभाचार्य ने शुद्धाद्वैत नामक दर्शन का प्रतिपादन किया।
3. राजस्थान में इस सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ कहाँ स्थित है?
राजस्थान में इस सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ सिहाड़ गांव (नाथद्वारा) में स्थित है।
4. वल्लभ सम्प्रदाय में मंदिर और दर्शन को क्या कहा जाता है?
इस संप्रदाय में मंदिर को हवेली, व दर्शन को झाँकी कहा जाता है।
5. नाथद्वारा की कौन-सी कला प्रसिद्ध है?
नाथद्वारा की ‘पिछवाई’ पेंटिंग प्रसिद्ध है।
6. अष्ट छाप कवि मंडल की स्थापना किसने की?
वल्लभाचार्य के पुत्र विठ्ठलनाथ ने ‘अष्ट छाप कवि मंडल’ की स्थापना की।
निष्कर्ष
वल्लभ सम्प्रदाय भारतीय वैष्णव परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसने शुद्धाद्वैत दर्शन और पुष्टिमार्ग के माध्यम से भक्ति जगत को समृद्ध किया। वल्लभाचार्य के दार्शनिक विचारों और विठ्ठलनाथ के सांस्कृतिक योगदान ने इस सम्प्रदाय को अद्वितीय पहचान दी। राजस्थान में नाथद्वारा, कांकरोली और कोटा स्थित मंदिर इस सम्प्रदाय की जीवंत परंपराओं के प्रमाण हैं। अन्नकूट महोत्सव और पिछवाई चित्रकला ने इसकी सांस्कृतिक विरासत को और समृद्ध किया है। वल्लभ सम्प्रदाय की यह अनूठी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत आज भी करोड़ों भक्तों के लिए आस्था और भक्ति का केंद्र बनी हुई है।