भूमिका
भारत में वित्तीय प्रणाली की स्थिरता और ऋणदाताओं के हितों की सुरक्षा के लिए वसूली तंत्रों का विकास एक निरंतर प्रक्रिया रही है। 1990 के दशक से पहले, ऋण वसूली की प्रक्रिया सामान्य न्यायालयों के माध्यम से होती थी, जो लंबी, जटिल और अक्सर अप्रभावी साबित होती थी। बैंकों और वित्तीय संस्थानों (FIs) के लिए बड़ी मात्रा में गैर-निष्पादित आस्तियों (NPAs) की समस्या ने विशिष्ट वसूली तंत्रों की आवश्यकता को जन्म दिया। इसी आवश्यकता के परिणामस्वरूप लोक अदालतों, ऋण वसूली अधिकरणों (DRT), दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) 2016 जैसे विशेष मंचों और कानूनों का सृजन हुआ।
यह लेख तीन प्रमुख वसूली तंत्रों—लोक अदालत, DRT/DRAT और IBC 2016—का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो भारत की वसूली कानूनी संरचना की रीढ़ हैं।
भाग 1: लोक अदालत – प्रक्रिया और फायदे
परिचय
लोक अदालत एक वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्र है जिसका उद्देश्य न्यायालयों के बोझ को कम करने और पक्षकारों के बीच सौहार्दपूर्ण समझौते के माध्यम से विवादों का त्वरित निपटान सुनिश्चित करना है। यह विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत स्थापित की जाती है।
प्रक्रिया
आवेदन: कोई भी पक्षकार विवाद को लोक अदालत में ले जाने का आवेदन कर सकता है, या न्यायालय स्वयं भी मामले को लोक अदालत को भेज सकता है।
गठन: लोक अदालत की अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश या कानूनी विशेषज्ञ करते हैं, जिनके साथ दो अन्य सदस्य (सामाजिक कार्यकर्ता/वकील) होते हैं।
सुनवाई: प्रक्रिया अनौपचारिक और मैत्रीपूर्ण होती है। पक्षकार बिना वकील के स्वयं उपस्थित हो सकते हैं।
समझौता: यदि समझौता हो जाता है, तो लोक अदालत एक अवार्ड पारित करती है।
अवार्ड की कानूनी स्थिति: लोक अदालत का अवार्ड एक दीवानी न्यायालय के डिक्री के समान ही अंतिम और बाध्यकारी होता है। इसके खिलाफ कोई अपील नहीं की जा सकती, केवल उच्च न्यायालय में संवैधानिक रिट याचिका दायर की जा सकती है।
ऋण वसूली में प्रासंगिकता
छोटे और मध्यम स्तर के ऋण विवादों (आमतौर पर 20 लाख रुपये तक) के लिए उपयुक्त।
बैंक और ऋणी ब्याज में छूट, मूलधन की किश्तों में वापसी, या एकमुश्त भुगतान जैसी शर्तों पर सहमत हो सकते हैं।
प्रक्रिया गोपनीय और संरचनात्मक होती है।
फायदे
शीघ्र निपटान: मामले महीनों में निपटाए जा सकते हैं, जबकि नियमित अदालतों में वर्षों लग जाते हैं।
कम लागत: कोई कोर्ट फीस नहीं, और वकीलों की आवश्यकता नहीं।
सौहार्दपूर्ण वातावरण: विवादित पक्षों के बीच संबंध बनाए रखने में मदद करता है।
कानूनी वैधता: अवार्ड कानूनी रूप से लागू करने योग्य होता है।
न्यायालयों पर बोझ कम: लाखों लंबित मामलों के निपटान में सहायक।
सीमाएँ
केवल तभी प्रभावी है जब दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार हों।
जटिल बड़े ऋण मामलों के लिए उपयुक्त नहीं।
अवार्ड के बाद भी, वास्तविक वसूली के लिए कार्यान्वयन प्रक्रिया की आवश्यकता हो सकती है।
भाग 2: ऋण वसूली अधिकरण (DRT) और ऋण वसूली अपीलीय अधिकरण (DRAT)
पृष्ठभूमि
ऋण वसूली अधिकरण (DRT) की स्थापना ऋण वसूली अधिकरण अधिनियम, 1993 (RDDBFI Act) के तहत बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋणों की त्वरित वसूली के लिए की गई थी। DRAT, DRT के आदेशों के खिलाफ अपीलीय अधिकरण है।
संरचना
DRT:
पीठ: एक पूर्व न्यायाधीश या कम से कम पाँच वर्षों के अनुभव वाला जिला न्यायाधीश।
पुनरीक्षण अधिकारी: डिक्री के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार।
DRAT:
पीठ: एक पूर्व उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश।
अधिकार क्षेत्र
DRT 10 लाख रुपये से अधिक के ऋण वसूली मामलों की सुनवाई करता है।
बैंकों, वित्तीय संस्थानों के साथ-साथ विभिन्न वित्तीय संस्थाओं (एनबीएफसी सहित, कुछ शर्तों के अधीन) के मामले।
प्रक्रिया
आवेदन दाखिल: ऋणदाता DRT में एक मूल आवेदन (OA) दाखिल करता है।
समन जारी: DRT ऋणी को नोटिस जारी करता है।
प्रतिवाद दाखिल: ऋणी को 30 दिनों के भीतर प्रतिवाद दाखिल करना होता है (जिसे DRT बढ़ा सकता है)।
सुनवाई और निर्णय: DRT मामले की सुनवाई करता है और आदेश पारित करता है।
अपील: DRAT में DRT के आदेश के खिलाफ 30 दिनों के भीतर अपील की जा सकती है।
क्रियान्वयन: पुनरीक्षण अधिकारी डिक्री का क्रियान्वयन सुनिश्चित करता है, जिसमें संपत्ति की कुर्की और नीलामी शामिल हो सकती है।
कार्य और शक्तियाँ
दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) की तरह ही डिक्री पारित करना।
ऋणी की संपत्ति की कुर्की और नीलामी का आदेश।
ऋणी के खिलाफ समन या वारंट जारी करना।
सार्वजनिक जमा योजनाओं से संबंधित मामलों सहित विविध मामलों की सुनवाई।
लाभ
विशेषज्ञ मंच: ऋण वसूली मामलों के लिए समर्पित।
त्वरित प्रक्रिया: अधिनियम में निर्धारित समयसीमा (आदर्श रूप से 180 दिन)।
व्यापक शक्तियाँ: संपत्ति को सुरक्षित करने और वसूली सुनिश्चित करने के लिए।
एक ही मंच: एक ही मामले में एक से अधिक बैंकों के दावों का निपटान।
चुनौतियाँ
मामलों की भीड़: लंबित मामलों की बड़ी संख्या के कारण देरी।
तकनीकी सीमाएँ: कभी-कभी अत्यधिक प्रक्रियात्मकता।
कार्यान्वयन मुद्दे: डिक्री के बाद भी वास्तविक वसूली में व्यावहारिक कठिनाइयाँ।
भाग 3: दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC), 2016
क्रांतिकारी परिवर्तन
IBC 2016 भारत के कॉरपोरेट दिवाला समाधान ढाँचे में एक आधारभूत परिवर्तन लाया। इसने कई पुराने कानूनों को समेकित किया और “डिफॉल्ट” की अवधारणा पेश की, जिसमें ऋण चुकाने में विफलता को समय-आधारित घटना माना गया।
मुख्य उद्देश्य
कॉरपोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया (CIRP) के माध्यम से दिवालिया कंपनियों का पुनर्गठन और समाधान।
अधिकतम संपत्ति का मूल्य सुनिश्चित करना।
उद्यमशीलता को बढ़ावा देना और ऋण के समय पर समाधान को प्रोत्साहित करना।
राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) को केंद्रीय भूमिका प्रदान करना।
प्रक्रिया (CIRP)
आवेदन दाखिल: वित्तीय ऋणदाता, संचालन ऋणदाता, या कंपनी स्वयं NCLT के पास आवेदन कर सकती है (डिफॉल्ट होने पर)।
देय राशि: न्यूनतम 1 लाख रुपये (बढ़ाया जा सकता है)।
पेशेवर संकल्प व्यवसायी (RP) की नियुक्ति: NCLT 14 दिनों के भीतर CIRP शुरू करता है और एक RP नियुक्त करता है।
दावे आमंत्रित: RP 330 दिनों की समयसीमा के भीतर दावे आमंत्रित करता है।
ऋणदाता समिति (CoC): वित्तीय ऋणदाता CoC बनाते हैं, जो निर्णय लेती है।
समाधान योजना: CoC एक समाधान योजना स्वीकार कर सकती है (जिसे NCLT की मंजूरी चाहिए) या परिसमापन का विकल्प चुन सकती है।
परिसमापन: यदि कोई व्यवहार्य योजना नहीं है, तो कंपनी का परिसमापन किया जाता है।
IBC के प्रमुख पहलू
समयबद्ध प्रक्रिया: CIRP को 330 दिनों में पूरा करने का लक्ष्य।
ऋणदाता-नियंत्रित: CoC प्रक्रिया और परिणामों को नियंत्रित करती है।
पूर्वव्यापी प्रभाव: लेनदेन को अलग करने और धोखाधड़ीपूर्ण लेनदेन को चुनौती देने की शक्तियाँ।
पारदर्शिता और जवाबदेही: RP और CoC के लिए सख्त दिशा-निर्देश।
लाभ
समयबद्ध समाधान: पुराने कानूनों के तहत दशकों लगने की तुलना में त्वरित प्रक्रिया।
कॉरपोरेट प्रशासन में सुधार: डिफॉल्टरों के लिए कड़े परिणाम।
अर्थव्यवस्था के लिए लाभ: पूंजी को दोबारा कारगर बनाना, निवेशक विश्वास बढ़ाना।
व्यवहार्य व्यवसायों का संरक्षण: पुनर्गठन के माध्यम से नौकरियाँ बचाना।
चुनौतियाँ और संशोधन
NCLT की क्षमता: लंबित मामलों से निपटने के लिए संसाधनों और सदस्यों की कमी।
प्रक्रियात्मक देरी: विभिन्न चरणों में लगने वाला समय।
ऑपरेशनल क्रेडिटर्स का उपचार: उनकी भूमिका और अधिकारों पर बहस।
समाधान योजनाओं की गुणवत्ता: कुछ मामलों में कम वसूली दर।
तुलनात्मक विश्लेषण
| पहलू | लोक अदालत | DRT/DRAT | IBC 2016 |
|---|---|---|---|
| उद्देश्य | सहमति से विवाद समाधान | ऋण वसूली | कॉरपोरेट दिवाला समाधान/पुनर्गठन |
| कानूनी आधार | विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 | RDDBFI अधिनियम, 1993 | IBC, 2016 |
| अधिकार क्षेत्र | छोटे विवाद (आमतौरर पर ₹20 लाख तक) | ₹10 लाख से अधिक के ऋण | कॉरपोरेट ऋण (न्यूनतम ₹1 लाख) |
| प्रक्रिया समय | कुछ महीने | आदर्श: 180 दिन (वास्तविकता में अधिक) | लक्ष्य: 330 दिन |
| परिणाम | समझौता-आधारित अवार्ड | वसूली डिक्री | पुनर्गठन/परिसमापन |
| अपील | नहीं (केवल रिट) | DRAT में | NCLAT में |
| मुख्य लाभ | शीघ्र, कम लागत, सौहार्दपूर्ण | विशेषज्ञ मंच, व्यापक शक्तियाँ | समयबद्ध, ऋणदाता-केंद्रित, पुनर्गठन |
निष्कर्ष
भारत का वसूली तंत्र विविध और बहु-स्तरीय है, जो विभिन्न प्रकार और आकार के ऋण विवादों को संबोधित करता है। लोक अदालत छोटे मामलों के लिए एक सुलह और त्वरित मंच प्रदान करती है। DRT/DRAT बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए एक विशेष ऋण वसूली तंत्र है, हालांकि यह मामलों के बोझ और देरी से जूझ रहा है। IBC 2016 एक क्रांतिकारी कानून है जिसने कॉरपोरेट दिवाला समाधान को बदल दिया है, जो समयबद्ध पुनर्गठन और परिसमापन पर केंद्रित है।
इन तंत्रों की प्रभावशीलता संसाधनों, न्यायिक क्षमता और प्रक्रियात्मक सुधारों पर निर्भर करती है। भविष्य में, तकनीकी एकीकरण (जैसे ई-कोर्ट, ऑनलाइन फाइलिंग), क्षमता निर्माण, और इन तंत्रों के बीच बेहतर समन्वय वसूली प्रक्रियाओं को और अधिक कुशल और न्यायसंगत बना सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1: लोक अदालत में किस प्रकार के ऋण मामले ले जाए जा सकते हैं?
A1: लोक अदालत छोटे और मध्यम ऋण विवादों, आमतौर पर 20 लाख रुपये तक, के लिए उपयुक्त है, जहाँ दोनों पक्ष समझौते के लिए तैयार हों। इसमें कृषि ऋण, छोटे व्यवसाय ऋण, वाहन ऋण आदि शामिल हो सकते हैं।
Q2: क्या DRT का आदेश सीधे तौर पर ऋणी की संपत्ति को बेचने का आदेश दे सकता है?
A2: हाँ, DRT एक डिक्री पारित कर सकता है और पुनरीक्षण अधिकारी को ऋणी की संपत्ति की कुर्की और नीलामी का आदेश दे सकता है ताकि ऋण की वसूली सुनिश्चित की जा सके।
Q3: IBC के तहत “डिफॉल्ट” की परिभाषा क्या है?
A3: IBC के तहत, डिफॉल्ट तब होता है जब कोई कर्ज़दार ऋणदाता की माँग पर या ऋण चुकाने की नियत तारीख पर पूर्ण या आंशिक रूप से ऋण चुकाने में विफल रहता है, जब तक कि ऋण 1 लाख रुपये (केंद्र सरकार द्वारा संशोधित) से कम न हो।
Q4: IBC प्रक्रिया में ऋणदाता समिति (CoC) की क्या भूमिका है?
A4: CoC में वित्तीय ऋणदाता शामिल होते हैं जो कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) के प्रबंधन के लिए जिम्मेदार होते हैं। वे पेशेवर संकल्प व्यवसायी (RP) की नियुक्ति, समाधान योजनाओं का मूल्यांकन और उन्हें स्वीकार करने या अस्वीकार करने, और यदि आवश्यक हो तो परिसमापन का निर्णय लेते हैं।
Q5: क्या IBC के तहत व्यक्तिगत ऋणियों के लिए कोई प्रावधान है?
A5: हाँ, IBC में व्यक्तिगत दिवालियापन और साझेदारी फर्मों के लिए प्रावधान हैं (भाग III), हालांकि इन प्रावधानों को अभी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है। वर्तमान में, IBC मुख्य रूप से कॉरपोरेट दिवालियापन (भाग II) पर केंद्रित है।
Q6: यदि ऋणी DRT में दिखाई नहीं देता है तो क्या होता है?
A6: यदि ऋणी DRT को नोटिस मिलने के बाद उपस्थित नहीं होता है या प्रतिवाद दाखिल नहीं करता है, तो अधिकरण एक्स पार्टी (बिना सुनवाई के) कार्यवाही कर सकता है और ऋणदाता के पक्ष में डिफॉल्ट डिक्री पारित कर सकता है।
Q7: क्या लोक अदालत का अवार्ड चुनौती देने योग्य है?
A7: लोक अदालत का अवार्ड अंतिम और सभी पक्षों के लिए बाध्यकारी है। इसके खिलाफ किसी न्यायालय में कोई अपील नहीं की जा सकती। हालाँकि, उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में संविधान के अधीन रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग करके इसे चुनौती दी जा सकती है, यदि यह मूलभूत प्रक्रिया या न्यायिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
Q8: IBC और DRT के बीच मुख्य अंतर क्या है?
A8: IBC एक समग्र दिवाला समाधान और पुनर्गठन संहिता है जो कॉरपोरेट इकाई के भाग्य (पुनर्गठन या परिसमापन) पर केंद्रित है, जबकि DRT एक विशिष्ट ऋण वसूली अधिकरण है जो बैंकों/वित्तीय संस्थानों द्वारा ऋणियों से ऋण वसूली पर केंद्रित है। IBC समयबद्ध है और ऋणदाता समिति को महत्वपूर्ण नियंत्रण देता है।
Q9: क्या एक ही ऋण विवाद के लिए एक साथ एक से अधिक मंचों का दृष्टिकोण किया जा सकता है?
A9: आम तौर पर, नहीं। सिद्धांत “एक मामला, एक मंच” लागू होता है। एक बार जब कोई मामला DRT या NCLT में ले जाया जाता है, तो आम तौर पर अन्य मंचों पर समानांतर कार्यवाही की अनुमति नहीं होती है, जब तक कि कानून द्वारा अनुमति न दी गई हो। हालांकि, विशिष्ट परिस्थितियों में, IBC प्रक्रिया को DRT या अन्य कार्यवाही पर वरीयता दी जाती है।
Q10: भारत में वसूली तंत्र की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
A10: प्रमुख चुनौतियों में न्यायिक मंचों पर मामलों की भारी संख्या, प्रक्रियात्मक देरी, समन्वय की कमी, कार्यान्वयन मुद्दे, और संसाधनों की कमी शामिल हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीकी उन्नयन, क्षमता निर्माण, और कानूनी सुधारों की आवश्यकता है।