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प्रथम तराइन युद्ध (1191 ई.): पृथ्वीराज की विजय और खोया हुआ अवसर
पृष्ठभूमि:
1191 ई. का तराइन का प्रथम युद्ध भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सैन्य संघर्षों में से एक है। यह युद्ध दिल्ली-अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय और ग़ज़नी के शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी के बीच लड़ा गया। गोरी ने 1175 ई. से भारत पर आक्रमण शुरू किए थे और 1191 तक वह पंजाब के बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुका था। तबाहपुर (वर्तमान सरहिन्द) के किले पर उसका नियंत्रण था, जो चौहान साम्राज्य के लिए सीधी चुनौती थी।
युद्ध की तैयारी:
पृथ्वीराज चौहान ने गोरी की बढ़ती शक्ति को रोकने का निर्णय लिया। उसने एक विशाल सेना तैयार की जिसमें अजमेर, दिल्ली और अन्य सहयोगी राजपूत शासकों की सेनाएँ शामिल थीं। सेना में हाथी, घुड़सवार और पैदल सैनिकों का विशाल संगठन था। दूसरी ओर, गोरी की सेना मुख्यतः हल्की घुड़सवार सेना और तीरंदाजों से लैस थी, जो तेज गति से हमला करने और पीछे हटने की रणनीति में माहिर थी।
युद्ध स्थल और रणनीति:
यह युद्ध वर्तमान हरियाणा के करनाल जिले के निकट तराइन (तरावड़ी) के मैदान में लड़ा गया। पृथ्वीराज ने पारंपरिक राजपूत रणनीति अपनाई – केंद्र में हाथी सेना, पंखों पर घुड़सवार सेना और आगे पैदल सैनिक। गोरी ने अपनी मोबाइल घुड़सवार सेना का उपयोग करते हुए तीरंदाजी से हमला शुरू किया।
युद्ध का घटनाक्रम:
युद्ध का आरंभ चौहान सेना के पक्ष में रहा। गोविन्दराय, पृथ्वीराज के एक सेनापति, ने गोरी के दाहिने पंख पर भारी हमला किया। कहा जाता है कि गोविन्दराय के भाले के वार से गोरी घायल हो गया और वह मैदान छोड़कर भागने को मजबूर हुआ। इसके बाद चौहान सेना ने गोरी की सेना को खदेड़ना शुरू किया।
परिणाम:
पृथ्वीराज चौहान ने तराइन के प्रथम युद्ध में निर्णायक विजय प्राप्त की। गोरी को भागकर ग़ज़नी लौटना पड़ा। चौहान सेना ने तबाहपुर का किला वापस जीत लिया। यह पृथ्वीराज की सबसे बड़ी सैन्य सफलता थी।
रणनीतिक गलती:
यहीं पर पृथ्वीराज से बड़ी रणनीतिक भूल हुई। उसने पराजित गोरी का पीछा नहीं किया और न ही उसकी शक्ति को पूरी तरह नष्ट करने का प्रयास किया। इसने गोरी को पुनर्गठित होने और वापसी की योजना बनाने का अवसर दिया।
द्वितीय तराइन युद्ध (1192 ई.): वह दुर्भाग्यपूर्ण मोड़
पुनः तैयारी:
गोरी ने अपनी हार से सबक सीखा। उसने अगले एक वर्ष में एक विशाल और बेहतर सज्जित सेना तैयार की। इस बार उसने 1,20,000 सैनिकों की सेना तैयार की, जिसमें विशेष रूप से प्रशिक्षित घुड़सवार तीरंदाज शामिल थे। सबसे महत्वपूर्ण बात, उसने अपनी रणनीति बदली – अब वह सीधे टकराव से बचकर छापामार युद्ध करने की योजना बना रहा था।
पृथ्वीराज चौहान ने भी सेना तैयार की, लेकिन वह पहले युद्ध की सफलता से आश्वस्त था। उसने गोरी की नई रणनीति और सेना की क्षमता को कम आंका।
युद्ध की नई रणनीति:
दिसंबर 1192 में दोनों सेनाएँ फिर तराइन के मैदान में आमने-सामने हुईं। गोरी ने एक नवीन रणनीति अपनाई:
झूठी पीछे हटने की रणनीति: उसने अपनी हल्की घुड़सवार सेना को आगे करके हमला करवाया और फिर पीछे हटने का नाटक किया।
राजपूत सेना को बिखेरना: यह चाल सफल रही। राजपूत सेना ने इसे असली पीछे हटना समझा और बिना संगठित रहते हुए पीछा करना शुरू कर दिया।
घेराव और आक्रमण: जब राजपूत सेना बिखर गई और थक गई, तो गोरी ने अपनी ताजा सेना के साथ अचानक पलटवार किया।
निर्णायक संघर्ष:
इस बार युद्ध का पैटर्न बिल्कुल बदल गया था। गोरी की सेना ने राजपूत सेना के पंखों पर हमला किया। हाथी सेना, जो पहले युद्ध में प्रभावी थी, इस बार मोबाइल घुड़सवारों के सामने असहाय साबित हुई। चौहान सेना के संचार और संगठन टूट गए।
पृथ्वीराज की पराजय और बंदीगृह:
ऐसा माना जाता है कि पृथ्वीराज को बंदी बना लिया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। कुछ स्रोतों के अनुसार, वह युद्ध में ही मारा गया। दोनों ही स्थितियों में, परिणाम एक ही था – चौहान साम्राज्य का पतन और गोरी की निर्णायक विजय।
तराइन युद्धों का ऐतिहासिक महत्व
तात्कालिक प्रभाव:
चौहान सत्ता का अंत
दिल्ली और अजमेर पर गोरी का अधिकार
उत्तरी भारत में इस्लामी शासन की नींव
दीर्घकालिक परिणाम:
भारतीय इतिहास का मोड़: यह युद्ध भारतीय इतिहास का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके बाद उत्तरी भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
सैन्य रणनीति में परिवर्तन: इसने भारत में युद्ध रणनीतियों में बदलाव ला दिया। पारंपरिक हाथी-केंद्रित सेनाएँ अब पुरानी पड़ गईं।
राजनीतिक एकता का अभाव: इस हार ने भारतीय राज्यों के बीच एकता के अभाव को उजागर किया।
सबक:
तराइन के युद्ध हमें कई सबक सिखाते हैं:
रणनीतिक सतर्कता: पहली विजय के बाद सतर्कता न बरतना घातक सिद्ध हुआ।
नवीनता: गोरी ने अपनी रणनीति बदली, जबकि पृथ्वीराज पुरानी रणनीति पर ही अड़े रहे।
शत्रु का मूल्यांकन: दुश्मन की क्षमता को कम आंकना एक बड़ी भूल थी।
निष्कर्ष
1191 और 1192 के तराइन युद्ध न केवल दो शासकों के बीच का संघर्ष थे, बल्कि दो अलग-अलग सैन्य परंपराओं, रणनीतियों और विश्वदृष्टियों का टकराव थे। पहले युद्ध में पृथ्वीराज की विजय ने दिखाया कि भारतीय सेनाएँ शक्तिशाली थीं, लेकिन दूसरे युद्ध में गोरी की जीत ने रणनीतिक नवीनता और अनुकूलन क्षमता का महत्व प्रदर्शित किया। ये युद्ध आज भी सैन्य रणनीति, नेतृत्व और ऐतिहासिक निर्णयों के अध्ययन के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
तराइन युद्ध से जुड़े 5 प्रमुख प्रश्नोत्तर (FAQs)
1. तराइन के युद्ध कब और किसके बीच हुए थे?
तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ई. में और द्वितीय युद्ध 1192 ई. में लड़ा गया। ये युद्ध दिल्ली-अजमेर के चौहान शासक पृथ्वीराज तृतीय और ग़ज़नी के शहाबुद्दीन मोहम्मद गोरी के बीच लड़े गए।
2. पहले युद्ध में कौन विजयी हुआ और क्यों?
प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान विजयी हुआ। उसकी विशाल सेना और पारंपरिक राजपूत रणनीति के सामने गोरी की सेना टिक नहीं पाई। गोरी स्वयं घायल हुआ और मैदान छोड़कर भागना पड़ा।
3. दूसरे युद्ध में गोरी की जीत का रहस्य क्या था?
द्वितीय युद्ध में गोरी ने पूरी तरह नई रणनीति अपनाई:
झूठी पीछे हटने की रणनीति
हल्की घुड़सवार सेना का प्रभावी उपयोग
राजपूत सेना को बिखेरने और थकाने की योजना
बेहतर तैयारी और सैन्य संगठन
4. इन युद्धों का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परिणाम क्या था?
सबसे महत्वपूर्ण परिणाम था उत्तरी भारत में इस्लामी शासन की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होना। इसके बाद दिल्ली सल्तनत की नींव पड़ी, जिसने भारत के इतिहास की दिशा बदल दी।
5. पृथ्वीराज की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती क्या थी?
पृथ्वीराज की सबसे बड़ी गलती थी पहले युद्ध में विजय के बाद गोरी का पीछा न करना और उसकी शक्ति को पूरी तरह नष्ट न करना। इसने गोरी को पुनर्गठित होने और नई रणनीति के साथ वापस आने का अवसर दिया।