1301 ई. की रणथंभौर घेराबंदी: हम्मीर देव चौहान की अंतिम लड़ाई

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ऐतिहासिक संदर्भ: एक निर्णायक संघर्ष की पृष्ठभूमि

1301 ई. की रणथंभौर घेराबंदी मध्यकालीन भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण सैन्य घटनाओं में से एक है। यह घटना दरअसल 1299-1301 ई. के बीच चले रणथंभौर अभियान का अंतिम और निर्णायक चरण थी, जिसे अक्सर एक ही सतत संघर्ष के रूप में देखा जाता है। अलाउद्दीन खिलजी, जिसने 1296 ई. में दिल्ली सल्तनत की गद्दी संभाली थी, राजस्थान के स्वतंत्र हिंदू राज्यों को अपने अधीन करने के मिशन पर था। रणथंभौर, अपनी दुर्गम स्थिति और प्रतिरोध की प्रतिष्ठा के कारण, उसकी प्राथमिकता बन गया था।

उस समय रणथंभौर पर हम्मीर देव चौहान का शासन था – एक ऐसा शासक जिसने न केवल अपने राज्य की स्वायत्तता बनाए रखी थी, बल्कि खिलजी के विरुद्ध एक चुनौती के रूप में उभरा था। हम्मीर की सबसे बड़ी ‘गलती’ यह थी कि उसने अलाउद्दीन के भतीजे और कुछ अन्य विद्रोही मुस्लिम सरदारों को शरण दे दी थी, जो खिलजी से बचकर भागे थे।

घेराबंदी की शुरुआत: एक लंबे संघर्ष का आरंभ

पहले प्रयास की विफलता:
1299 ई. में अलाउद्दीन ने अपने सेनापतियों नुसरत खाँ और उलुग खाँ के नेतृत्व में रणथंभौर पर पहला आक्रमण करवाया था। हालाँकि, यह अभियान पूरी तरह सफल नहीं हो सका। रणथंभौर के दुर्गम किले और हम्मीर देव के कुशल नेतृत्व के सामने खिलजी की सेना को पीछे हटना पड़ा।

दूसरे अभियान का निर्णय:
इस असफलता से सबक लेते हुए, अलाउद्दीन ने स्वयं रणथंभौर पर आक्रमण का निर्णय लिया। 1301 ई. में वह एक विशाल और बेहतर सुसज्जित सेना के साथ रणथंभौर पहुँचा। इस बार उसकी रणनीति स्पष्ट थी – लंबी घेराबंदी के माध्यम से किले को घुटने टिकवाना

रणथंभौर किले की स्थिति और सुरक्षा प्रबंध

रणथंभौर का किला अपनी प्राकृतिक सुरक्षा के लिए विख्यात था:

  • भौगोलिक स्थिति: एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित, तीन ओर से खड़ी चट्टानों से घिरा

  • एकमात्र प्रवेश द्वार: संकरा और आसानी से रक्षा योग्य

  • आंतरिक जल स्रोत: किले के अंदर कुएँ और जलाशय

  • भोजन भंडार: लंबी घेराबंदी के लिए अनाज के भंडार

हम्मीर देव ने किले की सुरक्षा को और मजबूत किया था:

  • दीवारों की मरम्मत और ऊँचाई बढ़ाई

  • प्रवेश द्वारों को और मजबूत बनाया

  • पर्याप्त मात्रा में शस्त्रास्त्र और युद्ध सामग्री का संग्रह

  • स्थानीय भील जनजाति के धनुर्धरों को सैन्य सेवा में शामिल किया

खिलजी की घेराबंदी रणनीति

अलाउद्दीन खिलजी ने इस बार एक व्यवस्थित घेराबंदी रणनीति अपनाई:

सेना का विस्तार और व्यवस्था:

  • किले के चारों ओर सेना के शिविर स्थापित किए गए

  • सभी निकास और प्रवेश मार्गों को अवरुद्ध किया गया

  • निरंतर पहरेदारी और गश्त की व्यवस्था

घेराबंदी यंत्र और तकनीक:

  • मंगोनल (तोप के पूर्ववर्ती): दूर से भारी पत्थर फेंकने के लिए

  • आरिस (सुरंग खोदने वाले): किले की दीवारों के नीचे सुरंगें बनाने के विशेषज्ञ

  • घेराबंदी मीनारें: लकड़ी की चलती मीनारें जिनसे किले पर तीर चलाए जा सकते थे

  • बेलनाकार लट्ठे: दीवारों को तोड़ने के लिए

मनोवैज्ञानिक युद्ध:

  • आतंक फैलाने के लिए किले के बाहर सैनिकों की निर्मम हत्याएँ

  • आत्मसमर्पण के लिए प्रलोभन और धमकियाँ

  • किले के अंदर अफवाहें फैलाने का प्रयास

घेराबंदी का दैनिक जीवन और संघर्ष

किले के अंदर की स्थिति:
प्रारंभ में, हम्मीर देव और उसके सैनिकों ने जमकर मुकाबला किया:

  • दीवारों से तीरों और पत्थरों की बौछार

  • रात के समय छापामार हमले

  • दुश्मन की सुरंगों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करना

समय के साथ बदलती परिस्थितियाँ:
कई महीनों की घेराबंदी के बाद किले के अंदर की स्थिति कठिन होती गई:

  1. भोजन की कमी: अनाज के भंडार समाप्त होने लगे

  2. जल संकट: कुएँ सूखने लगे

  3. बीमारियाँ: भीड़भाड़ और अस्वच्छता से बीमारियाँ फैलीं

  4. मनोबल में कमी: लंबी घेराबंदी से सैनिक थक गए

राजपूतों का प्रतिरोध:
इन कठिनाइयों के बावजूद, हम्मीर देव के नेतृत्व में राजपूत योद्धाओं ने हार नहीं मानी:

  • दीवारों की रक्षा के लिए निरंतर पहरा

  • दुश्मन के हर हमले का मुकाबला

  • संसाधनों का समान वितरण

निर्णायक आक्रमण और अंतिम संघर्ष

खिलजी की अंतिम रणनीति:
अलाउद्दीन ने देखा कि घेराबंदी का प्रभाव पड़ रहा है। उसने अंतिम आक्रमण की योजना बनाई:

  1. दीवारों का कमजोर होना: सुरंगों के माध्यम से दीवारों के नीचे विस्फोटक लगाए गए

  2. समन्वित हमला: एक साथ कई स्थानों से हमला

  3. मनोवैज्ञानिक दबाव: आत्मसमर्पण के लिए अंतिम चेतावनी

अंतिम युद्ध:
जब खिलजी की सेना ने किले में प्रवेश किया, तो भीषण युद्ध हुआ:

  • राजपूत योद्धाओं ने हर गली और हर मोड़ पर मुकाबला किया

  • हम्मीर देव स्वयं युद्धभूमि में उतरे

  • महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया

जौहर और साका: स्वाभिमान का अंतिम प्रदर्शन

जब हार निश्चित हो गई, तो हम्मीर देव और उसके सैनिकों ने राजपूत परंपरा के अनुसार अंतिम निर्णय लिया:

जौहर:

  • राजपूत महिलाओं ने स्वेच्छा से चिता में प्रवेश किया

  • बच्चों को भी माताओं के साथ भेजा गया

  • यह निर्णय गुलामी से बेहतर मृत्यु के लिए था

साका:

  • शेष राजपूत योद्धाओं ने केसरिया वस्त्र धारण किए

  • उन्होंने किले के द्वार खोल दिए

  • वे दुश्मन पर टूट पड़े, जानते हुए कि यह उनका अंतिम युद्ध है

हम्मीर देव का अंत:
हम्मीर देव अंतिम सैनिक तक लड़ता रहा। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, वह वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारा गया।

घेराबंदी के परिणाम और ऐतिहासिक महत्व

तात्कालिक परिणाम:

  1. रणथंभौर का किला खिलजी के कब्जे में आ गया

  2. हम्मीर देव चौहान वंश का अंत हो गया

  3. किले को लूटा गया और उसकी संपदा दिल्ली भेजी गई

  4. रणथंभौर दिल्ली सल्तनत का एक प्रशासनिक केंद्र बन गया

ऐतिहासिक महत्व:

  1. राजस्थान विजय का मोड़: इसके बाद खिलजी ने अन्य राजस्थानी किलों पर आक्रमण किए

  2. घेराबंदी युद्ध कला: भारत में घेराबंदी युद्ध के नए मानदंड स्थापित हुए

  3. प्रतिरोध की मिसाल: हम्मीर देव का प्रतिरोध भविष्य के विद्रोहों के लिए प्रेरणा बना

  4. साम्राज्यवादी विस्तार: दिल्ली सल्तनत के विस्तार में महत्वपूर्ण कदम

सैन्य सबक:

  1. लंबी घेराबंदी में संसाधन प्रबंधन का महत्व

  2. प्राकृतिक सुरक्षा के बावजूद तैयारी की आवश्यकता

  3. मनोबल बनाए रखने की चुनौती

  4. आधुनिक घेराबंदी तकनीकों का महत्व

विरासत और स्मृति

1301 की रणथंभौर घेराबंदी की स्मृति आज भी जीवित है:

  • साहित्यिक विरासत: हम्मीर रासो, हम्मीर महाकाव्य आदि में वर्णन

  • लोक परंपरा: राजस्थानी लोकगाथाओं में हम्मीर देव की वीरता

  • ऐतिहासिक अभिलेख: समकालीन और बाद के इतिहासकारों के विवरण

  • सांस्कृतिक प्रभाव: राजपूत शौर्य और बलिदान की परंपरा का हिस्सा

निष्कर्ष

1301 ई. की रणथंभौर घेराबंदी न केवल एक सैन्य संघर्ष थी, बल्कि दो विश्वदृष्टियों के बीच का टकराव थी। एक ओर अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा थी, तो दूसरी ओर हम्मीर देव चौहान की स्वतंत्रता और स्वाभिमान की भावना। इस घेराबंदी ने मध्यकालीन भारतीय युद्ध कला में एक नया अध्याय जोड़ा और घेराबंदी युद्ध के महत्व को रेखांकित किया।

हम्मीर देव की पराजय के बावजूद, उनका संघर्ष इतिहास में अमर हो गया। उन्होंने साबित किया कि भौतिक संसाधनों और सैन्य शक्ति में कमी के बावजूद, साहस और दृढ़ संकल्प से एक छोटा राज्य एक विशाल साम्राज्य को लंबे समय तक चुनौती दे सकता है। रणथंभौर की घेराबंदी भारतीय इतिहास की उन घटनाओं में से एक है जो न केवल अतीत की बात है, बल्कि स्वतंत्रता, सम्मान और बलिदान के शाश्वत मूल्यों की याद दिलाती है।


रणथंभौर घेराबंदी से जुड़े 5 प्रमुख प्रश्नोत्तर (FAQs)

1. 1301 ई. की रणथंभौर घेराबंदी क्यों महत्वपूर्ण थी?
यह घेराबंदी महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसने राजस्थान में दिल्ली सल्तनत की शक्ति स्थापित की और एक स्वतंत्र हिंदू राज्य के प्रतिरोध को समाप्त किया। यह अलाउद्दीन खिलजी की साम्राज्यवादी नीति की एक बड़ी सफलता थी।

2. हम्मीर देव चौहान ने इतने लंबे समय तक घेराबंदी का सामना कैसे किया?
हम्मीर देव ने निम्नलिखित उपायों से घेराबंदी का सामना किया:

  • किले की प्राकृतिक सुरक्षा का लाभ

  • पहले से तैयार भोजन और जल के भंडार

  • मजबूत दीवारें और रक्षा व्यवस्था

  • उच्च मनोबल और दृढ़ संकल्प

3. अलाउद्दीन खिलजी ने कौन-सी नई घेराबंदी तकनीकें इस्तेमाल कीं?
खिलजी ने निम्नलिखित तकनीकें इस्तेमाल कीं:

  • मंगोनल (तोप के पूर्ववर्ती) से भारी पत्थर फेंकना

  • किले की दीवारों के नीचे सुरंगें बनाना

  • घेराबंदी मीनारों का उपयोग

  • मनोवैज्ञानिक युद्ध और प्रलोभन की रणनीति

4. इस घेराबंदी का सबसे दुखद पहलू क्या था?
सबसे दुखद पहलू था जौहर – राजपूत महिलाओं और बच्चों का सामूहिक आत्मबलिदान। यह निर्णय इस विश्वास पर आधारित था कि मृत्यु गुलामी से बेहतर है।

5. इस घटना का आधुनिक इतिहास लेखन में क्या स्थान है?
आधुनिक इतिहास लेखन में इस घटना को निम्न रूप में देखा जाता है:

  • मध्यकालीन भारत में साम्राज्यवादी विस्तार का एक चरण

  • घेराबंदी युद्ध कला का एक उदाहरण

  • राजपूत प्रतिरोध और बलिदान का प्रतीक

  • भारतीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़

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