राजस्थान में प्रमुख उद्योग एवं औद्योगिक विकास की संभावनाएँ

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राजस्थान, क्षेत्रफल में देश का सबसे बड़ा राज्य होने के साथ-साथ कृषि, पशु संपदा और खनिज संसाधनों से समृद्ध है। लेकिन विडंबना यह है कि यह अन्य राज्यों की तुलना में औद्योगिक रूप से पिछड़ा हुआ माना जाता रहा है। स्वतंत्रता के समय राज्य में उद्योग नगण्य थे—मात्र 11 वृहद् उद्योग, 7 सूती वस्त्र उद्योग, 2 सीमेंट व 2 चीनी उद्योग तथा 207 पंजीकृत फैक्ट्रियाँ। आइए जानते हैं राजस्थान के औद्योगिक परिदृश्य की चुनौतियाँ, प्रगति और संभावनाएँ।


औद्योगिक विकास में बाधक परिस्थितियाँ

राज्य के औद्योगिक पिछड़ेपन के लिए अनेक भौगोलिक, ऐतिहासिक और आर्थिक कारक जिम्मेदार रहे हैं:

  1. प्रतिकूल धरातलीय स्वरूप: राज्य के आधे से अधिक भू-भाग में अरावली की पर्वत श्रृंखलाएँ, मरुस्थल एवं अर्द्ध-मरुस्थलीय दशाएँ हैं, जो बुनियादी ढाँचे और परिवहन को कठिन बनाती हैं।

  2. विरासत में मिला पिछड़ापन: देशी रियासतों के समय औद्योगिक विकास की उपेक्षा की गई।

  3. जल संसाधनों की कमी: अधिकांश क्षेत्रों में वर्षा की कमी और चंबल के अलावा साल भर बहने वाली नदियों का अभाव।

  4. तकनीकी ज्ञान एवं पूंजी का अभाव: पारंपरिक अर्थव्यवस्था और सीमित निवेश ने उद्योगों के विकास को रोका।

  5. बुनियादी ढाँचे और बाजार की सीमित पहुँच: परिवहन सुविधाओं का अभाव और आंतरिक बाजार का सीमित आकार।

इन चुनौतियों के बावजूद, राज्य सरकार ने औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनेक सकारात्मक कदम उठाए हैं।


औद्योगिक विकास को बढ़ावा: सरकारी पहल

  • जिला उद्योग केंद्र (DIC): 1978 में शुरू केंद्रीय योजना के तहत, राज्य में अब 36 जिला उद्योग केंद्र और 7 उपकेंद्र (ब्यावर, आबूरोड़, फालना, बालोतरा, किशनगढ़, मकराना, नीमराना) कार्यरत हैं, जो उद्यमियों को इनपुट और सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं।

  • औद्योगिक नीतियाँ: राज्य सरकार द्वारा 1978, 1990, 1994, 1998 और उसके बाद भी नई औद्योगिक नीतियाँ बनाई गई हैं, जिनमें कर छूट, भूमि आवंटन और अन्य प्रोत्साहन शामिल हैं।

  • विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ): 2015 में SEZ विधेयक पारित किया गया, जिससे नीमराना, जोधपुर, सीतापुरा (जयपुर) आदि में विशेष आर्थिक क्षेत्र स्थापित हुए।

  • NCR का लाभ: अलवर एवं भरतपुर का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में शामिल होना इन क्षेत्रों में औद्योगिक विकास की विपुल संभावनाएँ पैदा करता है।


राजस्थान के प्रमुख उद्योग: एक वर्गीकरण

1. वस्त्र उद्योग (Textile Industry)

राज्य का यह प्राचीनतम, परंपरागत और सबसे अधिक रोजगार देने वाला उद्योग है।

  • (i) सूती वस्त्र उद्योग:

    • राज्य निर्माण के समय केवल 7 मिलें थीं, जो 2010-11 तक बढ़कर 69 हो गईं।

    • प्रथम सूती मिल: दी कृष्णा मिल्स, 1889 में ब्यावर में स्थापित। संस्थापक दामोदर दास राठी को ‘वस्त्र क्रांति का भामाशाह’ कहा जाता है।

    • अन्य प्रारंभिक मिलें: एडवर्ड मिल्स (1906, ब्यावर) और श्री महालक्ष्मी मिल्स (1925, ब्यावर)।

    • प्रमुख केंद्र: भीलवाड़ा (“टेक्सटाइल सिटी ऑफ राजस्थान”), पाली, कोटा, उदयपुर, ब्यावर, श्रीगंगानगर।

  • (ii) ऊनी वस्त्र उद्योग:

    • राजस्थान देश में ऊन उत्पादन में अग्रणी है।

    • प्रमुख केंद्र: बीकानेर, जोधपुर, टोंक, जयपुर। बीकानेर अपने नमदा और कंबल उद्योग के लिए प्रसिद्ध है।

2. सीमेंट उद्योग

  • चूना पत्थर और जिप्सम की प्रचुर उपलब्धता के कारण राज्य सीमेंट उत्पादन में देश में प्रमुख स्थान रखता है।

  • प्रमुख केंद्र: चित्तौड़गढ़ (निम्बाहेड़ा), लखेरी (बूंदी), ब्यावर, उदयपुर, सिरोही।

3. चीनी उद्योग

  • एक कृषि आधारित उद्योग। गन्ने की खेती वाले जिलों में स्थित।

  • प्रमुख केंद्र: श्रीगंगानगर, चित्तौड़गढ़, बूंदी, भीलवाड़ा।

4. इंजीनियरिंग एवं धातु उद्योग

  • जस्ता-सीसा उद्योग: देश का एकमात्र उत्पादक। जावर (उदयपुर), राजपुरा-दरीबा (सीकर/अलवर)।

  • तांबा उद्योग: झुंझुनूं, अलवर, भीलवाड़ा।

  • इलेक्ट्रॉनिक्स एवं ऑटोमोबाइल: जयपुर (सीतापुरा, मानसरोवर), नीमराना (अलवर) और भिवाड़ी में क्लस्टर विकसित हुए हैं।

5. अन्य प्रमुख उद्योग

  • नमक उद्योग: संसार (फलोदी, जोधपुर), डीडवाना (नागौर)।

  • काँच उद्योग: जयपुर, उदयपुर, धौलपुर।

  • रासायनिक उद्योग: कोटा (केजीके, चम्बल फर्टिलाइजर्स)।

  • संगमरमर एवं हस्तशिल्प: राजनगर, मकराना, किशनगढ़।


औद्योगिक विकास की संभावनाएँ

  1. खनिज-आधारित उद्योग: सीसा-जस्ता, संगमरमर, ग्रेनाइट के प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन की अपार संभावना।

  2. नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग: थार मरुस्थल में सौर ऊर्जा और पश्चिमी जिलों में पवन ऊर्जा के विनिर्माण और रखरखाव से जुड़े उद्योग।

  3. कृषि-आधारित एवं खाद्य प्रसंस्करण: बागवानी, मसाले, दुग्ध उत्पादों के प्रसंस्करण के लिए विशाल अवसर।

  4. पर्यटन और हस्तशिल्प: हस्तशिल्प, गहने, ब्लू पॉटरी आदि के निर्यातोन्मुखी विकास की गुंजाइश।

  5. डीएफसी (डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर) का लाभ: पश्चिमी डीएफसी से जुड़े क्षेत्रों में लॉजिस्टिक्स हब और वेयरहाउसिंग के नए उद्योग विकसित होंगे।

  6. एमएसएमई और स्टार्ट-अप को बढ़ावा: तकनीकी शिक्षा और सरकारी नीतियों के माध्यम से नवाचार को प्रोत्साहन।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. राजस्थान की पहली सूती कपड़ा मिल कौन-सी थी और कहाँ स्थापित हुई?
राजस्थान की पहली सूती कपड़ा मिल ‘दी कृष्णा मिल्स’ थी, जिसकी स्थापना सन् 1889 में ब्यावर में हुई थी। इसके संस्थापक दामोदर दास राठी थे, जिन्हें ‘वस्त्र क्रांति का भामाशाह’ कहा जाता है।

2. राजस्थान के औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी बाधा क्या है?
राजस्थान के औद्योगिक विकास की प्रमुख बाधाएँ जल की कमी, प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियाँ (मरुस्थल, पहाड़), ऐतिहासिक पिछड़ापन, और बुनियादी ढाँचे व तकनीकी ज्ञान की कमी रही हैं।

3. ‘टेक्सटाइल सिटी ऑफ राजस्थान’ किसे कहा जाता है और क्यों?
भीलवाड़ा को ‘टेक्सटाइल सिटी ऑफ राजस्थान’ कहा जाता है। यहाँ सूती वस्त्र उद्योग का सबसे बड़ा और सघन क्लस्टर है, जिसमें कताई, बुनाई, प्रिंटिंग और प्रसंस्करण की सैकड़ों इकाइयाँ कार्यरत हैं।

4. राजस्थान में औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी संभावना किस क्षेत्र में है?
राजस्थान में औद्योगिक विकास की सबसे बड़ी संभावना नवीकरणीय ऊर्जा (सौर व पवन ऊर्जा) और खनिज-आधारित प्रसंस्करण उद्योगों (जैसे संगमरमर, ग्रेनाइट) में है। इसके अलावा, कृषि-आधारित खाद्य प्रसंस्करण में भी भारी गुंजाइश है।

5. NCR का दर्जा राजस्थान के किन जिलों के औद्योगिक विकास में मददगार है?
अलवर और भरतपुर जिलों को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में शामिल किया गया है। इससे इन जिलों में रियल एस्टेट, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और हल्के उद्योगों के तेजी से विकास की संभावना बढ़ गई है, क्योंकि ये दिल्ली के बाजार और बुनियादी ढाँचे के नजदीक हैं।

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