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भारतीय इतिहास के पन्नों में कुछ तारीखें ऐसी हैं जो मोड़ का काम करती हैं। 738 ई. (संभवतः विक्रम संवत 794-795) उन्हीं में से एक है। यह वह वर्ष है जब आधुनिक राजस्थान की धरती पर एक ऐसा भीषण युद्ध लड़ा गया जिसने न केवल भारत के राजनीतिक नक्शे को पुनर्परिभाषित किया, बल्कि अरबों के पूर्वी विस्तार को रोककर भारतीय सभ्यता के इतिहास की धारा ही मोड़ दी। यह मुख्य रूप से गुर्जर-प्रतिहार सम्राट नागभट्ट प्रथम और सिन्ध के अरब गवर्नर जुनैद बिन अब्द अर-रहमान अल-मुर्री के बीच लड़ा गया एक निर्णायक संघर्ष था।
पृष्ठभूमि: एक उभरता हुआ तूफान
8वीं शताब्दी का आरंभिक भारत परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। पश्चिम में, उमय्यद खिलाफत का विस्तारवादी रुख एक बड़े खतरे के रूप में उभर रहा था। 712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम ने सिन्ध पर विजय प्राप्त की थी। दशकों बाद, खलीफा हिशाम बिन अब्दुल मलिक (724-743 ई.) के शासनकाल में सिन्ध के गवर्नर जुनैद बिन अब्द अर-रहमान ने पूर्व और उत्तर की ओर विस्तार की महत्वाकांक्षी योजना बनाई। उसका लक्ष्य सिन्ध के पूर्व में स्थित समृद्ध और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों – मारवाड़, मेवाड़ और मालवा पर अधिकार करना था। ये क्षेत्र व्यापार मार्गों के केंद्र थे और इनपर नियंत्रण पूरे उत्तर भारत में प्रभुत्व स्थापित करने की कुंजी था।
दूसरी ओर, इसी समय उत्तरी भारत में एक नई शक्ति का उदय हो रहा था – गुर्जर-प्रतिहार वंश। इस वंश के शासक नागभट्ट प्रथम (लगभग 730-760 ई.) एक दूरदर्शी और महत्वाकांक्षी योद्धा थे। उन्होंने अवंति (मालवा) क्षेत्र में अपनी शक्ति को मजबूत किया और आसपास के क्षेत्रों को एकीकृत करना शुरू किया। जुनैद का आक्रमण सिर्फ एक सीमांत झड़प नहीं था; यह एक बड़े साम्राज्यवादी अभियान का हिस्सा था जो नागभट्ट के स्वयं के विस्तार के सपनों के सीधे टकराव में था।
संघर्ष की शुरुआत और भारतीय गठबंधन
जुनैद ने सिन्ध से सेना का नेतृत्व किया और राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में प्रवेश करते हुए मारवाड़ क्षेत्र पर धावा बोला। अरब इतिहासकारों के अनुसार, जुनैद ने कई मुहिमें चलाईं और कई किलों व नगरों पर अधिकार किया। यह खतरा इतना गहरा और व्यापक था कि इसने स्थानीय रूप से प्रतिद्वंद्वी रहे भारतीय शासकों को एक साझे शत्रु के विरुद्ध खड़े होने के लिए बाध्य कर दिया।
यहीं पर नागभट्ट प्रथम की कूटनीतिक और सैन्य दूरदर्शिता सामने आई। उन्होंने केवल अपनी प्रतिहार सेना ही नहीं खड़ी की, बल्कि एक शक्तिशाली गठबंधन (संगठित संधि) बनाई। इस गठबंधन में शामिल थे:
गुर्जर-प्रतिहार: मुख्य सेना, नागभट्ट के नेतृत्व में।
चालुक्य: दक्षिण से आए सहयोगी (संभवतः वल्लभ राज्य के, जो बाद में राष्ट्रकूट कहलाए)।
अन्य क्षेत्रीय शासक: मेवाड़, मारवाड़ और गुजरात के सामंत और राजपूत शासक, जिनके क्षेत्र सीधे खतरे में थे।
यह गठब�्धन सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक एकजुटता का ही नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व के संघर्ष का प्रतीक था। प्रत्येक शासक जानता था कि अगर अरब सेना को रोका नहीं गया तो उसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी।
युद्ध का मैदान और रणनीति
युद्ध राजस्थान के दुर्गम और विशाल मरुस्थलीय-अर्धमरुस्थलीय भूभाग में लड़ा गया। यह स्थान चुनाव भारतीय सेनाओं के लिए एक बड़ा रणनीतिक लाभ साबित हुआ। भारतीय सेनापतियों को अपने घरेलू मैदान का पूरा ज्ञान था, जबकि अरब सेना लंबी दूरी तय करके आई थी और इस तरह के भूभाग से अपरिचित थी।
भारतीय रणनीति में निम्नलिखित प्रमुख तत्व शामिल थे:
घुड़सवार सेना की श्रेष्ठता: राजपूत और प्रतिहार घुड़सवारों की गतिशीलता और आक्रमण कौशल ने अरब सेना को कई मोर्चों पर परेशान किया।
हस्तिसेना का मनोवैज्ञानिक प्रभाव: युद्ध हाथियों, जो उस समय भारतीय सेना का एक प्रमुख अंग थे, ने अरब घोड़ों और सैनिकों में भय पैदा किया। इन विशालकाय जीवों पर सवार धनुर्धर और भालेबाज भारी विनाश करने में सक्षम थे।
छापामार युद्ध तकनीक: रेतीले और पहाड़ी इलाकों में छिपकर होने वाले आकस्मिक हमलों से अरब सेना की रसद और संचार लाइनें बाधित हुईं।
जुनैद की सेना: उसके पास अनुभवी अरब और सिन्धी सैनिकों के साथ-साथ हल्की घुड़सवार सेना थी। उनकी रणनीति में तेजी से आगे बढ़ना और नगरों पर नियंत्रण करना शामिल था, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले घिसावट भरे युद्ध के लिए वे तैयार नहीं थे।
निर्णायक संघर्ष और परिणाम
वास्तविक युद्ध अत्यंत भीषण रहा होगा। ऐतिहासिक साक्ष्य (जैसे कि ग्वालियर प्रशस्ति और अरब इतिहासकार अल-बलाजुरी का “फुतूह अल-बुलदान”) बताते हैं कि नागभट्ट के नेतृत्व में भारतीय गठबंधन ने जुनैद की सेना को निर्णायक रूप से पराजित किया। अरब सेना को भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा और उन्हें बेतहाशा पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। जुनैद स्वयं इस युद्ध में मारा गया या बाद में मारा गया, जिससे अरब सेना में और अराजकता फैली।
इस विजय के तात्कालिक परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण थे:
अरब विस्तार का अंत: यह युद्ध वह अंतिम बड़ा प्रयास था जब उमय्यद खिलाफत ने सिन्ध के पूर्व में स्थायी रूप से विस्तार करने की कोशिश की। इस हार के बाद अरब मुख्यतः सिन्ध तक ही सीमित रह गए और भारत के आंतरिक भागों पर कब्जा करने का उनका सपना ध्वस्त हो गया।
गुर्जर-प्रतिहार वंश का उदय: नागभट्ट प्रथम की प्रतिष्ठा एक महान विजेता और ‘हिन्दू धर्म के रक्षक’ के रूप में स्थापित हो गई। उन्होंने ‘नरेश्वर’ (राजाओं का राजा) की उपाधि धारण की और अपने साम्राज्य का तेजी से विस्तार किया, जो बाद में कन्नौज तक पहुँचा और लगभग तीन शताब्दियों तक उत्तरी भारत की प्रमुख शक्ति बना रहा।
राजनीतिक स्थिरता: इस जीत ने उत्तर-पश्चिमी भारत में एक शक्तिशाली केन्द्रीय सत्ता (प्रतिहार) के उदय का मार्ग प्रशस्त किया, जिसने क्षेत्र में स्थिरता लाने में मदद की।
738 ई. के युद्ध का ऐतिहासिक महत्व
738 का यह युद्ध केवल एक सैन्य झड़प नहीं था; यह एक सभ्यतागत प्रतिरोध की शुरुआत थी।
सांस्कृतिक संरक्षण: इसने भारतीय संस्कृति, धर्म, कला और सामाजिक ढाँचे को एक बड़े बाहरी परिवर्तनकारी दबाव से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अगर अरब सफल होते, तो भारत का इतिहास और सांस्कृतिक परिदृश्य एकदम भिन्न होता।
एकता का संदेश: इसने विविधतापूर्ण भारतीय राजनीतिक इकाइयों को यह सिखाया कि सामूहिक खतरे का सामना एकजुट होकर ही किया जा सकता है। यह पाठ भविष्य के लिए एक मिसाल बना।
इतिहास का मोड़: कई इतिहासकार मानते हैं कि 712 ई. में सिन्ध की विजय और 738 ई. में राजस्थान में हार के बीच का यह छोटा सा कालखंड, भारत में इस्लामी शासन के प्रसार की गति और प्रकृति को निर्धारित करने वाला था। इसने उस प्रक्रिया में कम से कम तीन-साढ़े तीन शताब्दियों की देरी कर दी, जब 11वीं-12वीं सदी में तुर्क आक्रमण शुरू हुए।
निष्कर्ष:
738 ई. का राजस्थान युद्ध भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली, किंतु कभी-कभी उपेक्षित, अध्याय है। यह वह युद्ध था जहाँ नागभट्ट प्रथम के नेतृत्व में भारतीय शक्तियों ने न केवल एक आक्रमणकारी को रोका, बल्कि एक नए साम्राज्य की नींव रखी और भारतीय सभ्यता की स्वायत्तता को लंबे समय तक सुरक्षित रखा। राजस्थान की वीर भूमि पर लड़ा गया यह संघर्ह केवल जमीन का झगड़ा नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की लड़ाई थी – और इस लड़ाई में, भारत विजयी रहा।
738 ई. के राजस्थान युद्ध से जुड़े 5 महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
1. 738 ई. का युद्ध वास्तव में कहाँ लड़ा गया था?
यह युद्ध मुख्य रूप से आधुनिक राजस्थान के मारवाड़ और मेवाड़ क्षेत्र में लड़ा गया। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि यह संघर्ष राजस्थान के विस्तृत मरुस्थलीय और अर्ध-मरुस्थलीय इलाके में हुआ, जहाँ भारतीय सेनाओं को भौगोलिक लाभ था। कुछ विद्वान इसे “मरुयुद्ध” या “राजस्थान का सामरिक संघर्ष” भी कहते हैं।
2. इस युद्ध के मुख्य नायक कौन थे?
भारतीय पक्ष के प्रमुख नेता: गुर्जर-प्रतिहार सम्राट नागभट्ट प्रथम। उन्होंने ही चालुक्यों एवं अन्य राजपूत शासकों का गठबंधन बनाकर सेना का नेतृत्व किया।
अरब पक्ष के प्रमुख नेता: जुनैद बिन अब्द अर-रहमान अल-मुर्री, जो उस समय सिन्ध का अरब गवर्नर (वली) था।
3. क्या इस युद्ध का कोई प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत है?
हाँ, इस युद्ध का उल्लेख दो प्रमुख स्रोतों में मिलता है:
अरब इतिहासकार अल-बलाजुरी की किताब “फुतूह अल-बुलदान” (द कॉन्क्वेस्ट ऑफ कंट्रीज) में जुनैद की हार और मृत्यु का जिक्र है।
ग्वालियर प्रशस्ति (ग्वालियर अभिलेख) में नागभट्ट प्रथम की विजय और उनके द्वारा “अरबों के समुद्र” को रोकने का श्रेय दिया गया है।
4. इस युद्ध के तात्कालिक परिणाम क्या थे?
अरब सेना की निर्णायक हार हुई और जुनैद मारा गया (या युद्ध के तुरंत बाद मर गया)।
अरबों की पूर्वी विस्तार की महत्वाकांक्षा समाप्त हो गई। वे सिन्ध तक ही सीमित रह गए।
नागभट्ट प्रथम की शक्ति और प्रतिष्ठा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। उन्होंने “नरेश्वर” की उपाधि धारण की और गुर्जर-प्रतिहार साम्राज्य को उत्तरी भारत की सर्वप्रमुख शक्ति बना दिया।
5. 738 ई. का युद्ध भारत के इतिहास में इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?
इस युद्ध का दीर्घकालिक ऐतिहासिक महत्व बहुत गहरा है:
सभ्यतागत टकराव: यह भारतीय सभ्यता और इस्लामिक खिलाफत के बीच पहला बड़ा सैन्य टकराव था, जहाँ भारतीयों को सफलता मिली।
विस्तार पर रोक: इसने लगभग 300-350 वर्षों के लिए भारत के आंतरिक भागों पर अरब/इस्लामी विस्तार को रोक दिया। अगला बड़ा आक्रमण 11वीं सदी में महमूद गजनवी द्वारा हुआ।
राजनीतिक पुनर्गठन: इसने उत्तर भारत में प्रतिहारों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया, जो 8वीं-10वीं शताब्दी तक कन्नौज से शासन करते रहे।
सांस्कृतिक निरंतरता: भारतीय समाज, धर्म, कला और दर्शन को बिना बड़े बाहरी हस्तक्षेप के विकसित होने का अतिरिक्त समय मिला।