1. कृष्ण पक्ष (अंधेरी पखवाड़ा)
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पंचमी: नागपंचमी
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नाग देवता की पूजा की जाती है।
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दूध, फूल और चावल से नागों को भोग लगाया जाता है।
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नवमी: निडरी नवमी (नेवला पूजन)
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नेवले (मुंगूस) की पूजा की जाती है, क्योंकि यह सांपों का शत्रु माना जाता है।
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अमावस्या: हरियाली अमावस्या
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इसे श्रावणी अमावस्या भी कहते हैं।
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इस दिन वृक्षारोपण और प्रकृति पूजन का विशेष महत्व है।
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2. शुक्ल पक्ष (उजली पखवाड़ा)
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तृतीया: छोटी तीज (हरियाली तीज/श्रावणी तीज)
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यह पति-पत्नी के प्रेम और सुहाग का त्योहार है।
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जयपुर में धूमधाम से मनाई जाती है, जहाँ महिलाएँ झूलों पर झूलती हैं।
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सिंजारा: ससुराल पक्ष से नवविवाहिता को लहरिया (रंगीन ओढ़नी), मिठाई और उपहार भेजे जाते हैं।
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महिलाएँ हरी लहरिया ओढ़कर माँ पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं।
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पूर्णिमा:
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रक्षाबंधन: भाई-बहन का पावन पर्व।
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नारियल पूर्णिमा: समुद्र तटों पर नारियल अर्पित किए जाते हैं।
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श्रवण कुमार पूजन: भगवान शिव के भक्त श्रवण कुमार की कथा सुनकर उनकी पूजा की जाती है।
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श्रावण मास के प्रमुख मेले
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फतेहसागर मेला (उदयपुर)
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हरियाली अमावस्या पर आयोजित होता है।
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नौका विहार और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
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कल्पवृक्ष मेला (मांगलियावास, अजमेर)
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पवित्र वृक्ष के नीचे लोग मन्नतें माँगते हैं।
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बुड्ढा जोहड़ मेला (श्रीगंगानगर)
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किसानों द्वारा अच्छी फसल की कामना से मनाया जाता है।
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विशेष परंपराएँ
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लहरिया पहनने की रीत:
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श्रावण में रंग-बिरंगी लहरिया (ओढ़नी) पहनने का विशेष महत्व है।
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यह राजस्थानी संस्कृति की पहचान है।
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झूले की परंपरा:
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महिलाएँ हरियाली तीज पर झूला झूलती हैं और मौसमी गीत गाती हैं।
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श्रावण मास भक्ति, प्रकृति और उल्लास का संगम है!