राजस्थान की आध्यात्मिक भूमि में पनपे एक ऐसे सम्प्रदाय की जिसने सामाजिक समरसता और भक्ति का अनूठा संगम प्रस्तुत किया – निष्कलंक सम्प्रदाय। यह सम्प्रदाय न केवल धार्मिक आंदोलन था, बल्कि एक सामाजिक क्रांति भी थी, जिसने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देते हुए समाज के उपेक्षित वर्गों को आत्मसम्मान और आध्यात्मिक पहचान दिलाई।
प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय
निष्कलंक सम्प्रदाय 18वीं शताब्दी में राजस्थान में उत्पन्न एक प्रमुख भक्ति आंदोलन था, जिसकी स्थापना संत मावजी ने की थी। यह सम्प्रदाय मुख्य रूप से दक्षिणी राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर क्षेत्रों में फैला हुआ था। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने समाज के सभी वर्गों, विशेष रूप से आदिवासी और वंचित वर्गों के लोगों को आध्यात्मिक और सामाजिक मुक्ति का मार्ग दिखाया।
यह सम्प्रदाय केवल एक पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं था, बल्कि यह जीवन जीने का एक संपूर्ण दर्शन प्रस्तुत करता था। इसने सामाजिक बंधनों से ऊपर उठकर मानव मात्र की समानता का संदेश दिया और धार्मिक कर्मकांडों के स्थान पर सीधे ईश्वर से जुड़ने का मार्ग प्रशस्त किया। सम्प्रदाय की मुख्य विशेषता इसकी सरलता और सहजता थी, जिसमें जटिल धार्मिक कर्मकांडों या पुरोहितवाद के लिए कोई स्थान नहीं था।
सम्प्रदाय
निष्कलंक सम्प्रदाय मूलतः एक ऐसा आध्यात्मिक मार्ग था जो जाति-पाति, ऊँच-नीच के सभी भेदभावों से ऊपर उठकर सभी मनुष्यों की मौलिक समानता में विश्वास रखता था। संत मावजी ने इस सम्प्रदाय के माध्यम से यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि ईश्वर की दृष्टि में सभी मनुष्य समान हैं और कोई भी व्यक्ति जन्म के आधार पर छोटा या बड़ा नहीं होता। इस सम्प्रदाय की स्थापना एक ऐसे युग में हुई जब सामाजिक विषमताएं चरम पर थीं और निम्न जातियों के साथ भेदभाव पूर्ण व्यवहार किया जाता था। निष्कलंक सम्प्रदाय ने इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ आवाज उठाई और सभी वर्गों के लोगों को एक मंच पर लाने का कार्य किया।
प्रवर्तक
इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक संत मावजी थे, जिनका जन्म 1714 ईस्वी में हुआ था। राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति पोर्टल के अनुसार, उनका जन्म 18 जनवरी 1716 को हुआ था। उनके जीवन और शिक्षाओं ने न केवल एक नए आध्यात्मिक मार्ग का सूत्रपात किया, बल्कि सामाजिक क्रांति की भी नींव रखी। संत मावजी का जन्म एक ऐसे समय में हुआ था जब भारतीय समाज कठोर जाति व्यवस्था में जकड़ा हुआ था। उन्होंने अपनी शिक्षाओं के माध्यम से समाज के उत्पीड़ित वर्गों को न केवल आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक गरिमा भी प्रदान की। उनकी शिक्षाएँ सीधी-साधी और जनसामान्य की भाषा में थीं, जिसके कारण आम जनता आसानी से उनसे जुड़ सकी। संत मावजी ने अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा और आध्यात्मिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार में व्यतीत किया। उन्होंने समाज के सभी वर्गों, विशेषकर वंचित समुदायों के बीच जाकर उन्हें आत्मविश्वास और आत्मसम्मान का जीवन जीने का मार्ग दिखाया। उनकी शिक्षाओं में सदाचार, ईमानदारी, परिश्रम और सभी प्राणियों के प्रति प्रेम का संदेश निहित था।
सगुण /निर्गुण
निष्कलंक सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय ईश्वर के सगुण रूप विशेष रूप से श्रीकृष्ण और उनके ‘निष्कलंक’ रूप की उपासना पर बल देता है। इसके अनुयायी ईश्वर को साकार मानकर उनके विभिन्न रूपों की भक्ति में लीन रहते हैं। निष्कलंक सम्प्रदाय की यह धारणा इसे तत्कालीन अन्य कई सम्प्रदायों से अलग करती है। इसने ईश्वर की प्राप्ति के लिए सीधे हृदय से जुड़ने के मार्ग को प्रशस्त किया, जो सभी के लिए सुलभ था, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग से संबंध रखता हो। श्रीकृष्ण के ‘निष्कलंक’ रूप की उपासना इस सम्प्रदाय की मुख्य विशेषता है, जिसके कारण यह ‘निष्कलंक सम्प्रदाय’ के नाम से जाना जाता है।
प्रमुख पीठ/मंदिर
इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र साबला ग्राम (डूंगरपुर) में स्थित है। यह स्थान निष्कलंक सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है और यहाँ का मंदिर इस सम्प्रदाय की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। साबला ग्राम में स्थित यह पीठ सैकड़ों वर्षों से इस सम्प्रदाय की परंपराओं और शिक्षाओं का संरक्षण कर रही है। इसके अलावा, संत मावजी ने बेणेश्वर पीठ की स्थापना की थी, जो इस सम्प्रदाय का एक अन्य महत्वपूर्ण केंद्र है। बेणेश्वर पीठ की स्थापना ने इस सम्प्रदाय को संगठित रूप प्रदान किया और यह स्थान आज भी निष्कलंक सम्प्रदाय के अनुयायियों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल बना हुआ है।
रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ
निष्कलंक सम्प्रदाय की दार्शनिक और आध्यात्मिक शिक्षाएँ पाँच प्रमुख ग्रंथों में संरक्षित हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से चौपड़ा कहा जाता है। ये पाँच ग्रंथ इस सम्प्रदाय की बौद्धिक और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रमाण हैं:
मेघ सागर – यह ग्रंथ आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तार को दर्शाता है।
प्रेम सागर – इसमें भक्ति और प्रेम के दर्शन पर प्रकाश डाला गया है।
साम सागर – यह ग्रंथ शांति और समरसता के सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है।
रतन सागर – इसमें जीवन के मूल्यवान रत्नों (सिद्धांतों) का संकलन है।
अनंत सागर – यह ग्रंथ अनंत ईश्वरीय सत्ता के रहस्यों को उजागर करता है।
इन ग्रंथों में संत मावजी और उनके अनुयायियों की शिक्षाएँ संकलित हैं, जो न केवल आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक जीवन के लिए भी मार्गदर्शक का कार्य करती हैं। इनकी भाषा सरल और जनसामान्य की बोलचाल की भाषा में होने के कारण ये आम जनता में अत्यंत लोकप्रिय हुईं।
विशिष्ट तथ्य
निष्कलंक सम्प्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:
श्रीकृष्ण एवं उनके दूसरे रूप ‘निष्कलंक’ को अपना आराध्य मानने के कारण यह संप्रदाय ‘निष्कलंक’ कहलाता है। यह इस सम्प्रदाय की सबसे प्रमुख विशेषता है जो इसे अन्य समकालीन सम्प्रदायों से अलग करती है।
संत मावजी ने बेणेश्वर पीठ की स्थापना की थी, जो इस सम्प्रदाय के संगठन और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस सम्प्रदाय में रासलीला को विशेष महत्व दिया गया है। रासलीला के माध्यम से भक्ति भावना का प्रसार और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया जाता है।
निष्कलंक सम्प्रदाय की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी सामाजिक समावेशिता थी। इसमें सभी जातियों और वर्गों के लोगों का स्वागत था और सभी को समान अधिकार प्रदान किए गए थे।
इस सम्प्रदाय में गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका थी। गुरु को ईश्वर प्राप्ति का मार्गदर्शक माना जाता था और शिष्य परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता था।
निष्कलंक सम्प्रदाय ने नारी शिक्षा और उन्नति पर विशेष बल दिया। संत मावजी ने महिलाओं को भी आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की और उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थान दिलाने का प्रयास किया।
निष्कर्ष
निष्कलंक सम्प्रदाय भारतीय भक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अंग है, जिसने सामाजिक समानता और सगुण ईश्वर भक्ति का संदेश फैलाया। संत मावजी की शिक्षाएँ और इसके प्रमुख अनुयायियों का योगदान आज भी इस क्षेत्र की धार्मिक-सामाजिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। इस सम्प्रदाय ने न केवल आध्यात्मिक जगत में बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रयास किया। इसने उस युग में समानता और भाईचारे का संदेश दिया जब समाज कठोर जातिगत भेदभाव में विभाजित था। आज भी, सैकड़ों वर्षों बाद, निष्कलंक सम्प्रदाय अपने अनुयायियों के बीच जीवित है और संत मावजी के संदेश लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं। उनकी शिक्षाएँ मानवता, समानता और आध्यात्मिक जागृति का शाश्वत संदेश देती हैं, जो आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके अपने समय में थीं। संत मावजी का यह विश्वास कि ईश्वर सभी के हृदय में विद्यमान है और कोई भी व्यक्ति सच्ची भक्ति और सदाचार के बल पर उसे प्राप्त कर सकता है, आज भी हज़ारों लोगों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो रहा है। निष्कलंक सम्प्रदाय की यही शाश्वत विरासत इसे भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करती है।
निष्कलंक सम्प्रदाय के बारे में अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. निष्कलंक सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं और इसकी स्थापना कब हुई?
निष्कलंक सम्प्रदाय के संस्थापक संत मावजी हैं। राजस्थान सरकार के कला एवं संस्कृति पोर्टल के अनुसार उनका जन्म 18 जनवरी 1716 को हुआ था।
2. यह सम्प्रदाय सगुण उपासना में विश्वास रखता है या निर्गुण?
निष्कलंक सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय श्रीकृष्ण और उनके ‘निष्कलंक’ रूप की उपासना पर बल देता है।
3. इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र कहाँ स्थित है?
इस सम्प्रदाय का मुख्य केंद्र साबला ग्राम (डूंगरपुर) में स्थित है। संत मावजी ने बेणेश्वर पीठ की भी स्थापना की थी जो इस सम्प्रदाय का एक महत्वपूर्ण केंद्र है।
4. इस सम्प्रदाय के प्रमुख ग्रंथ कौन-से हैं?
इस सम्प्रदाय के पाँच प्रमुख ग्रंथ हैं जिन्हें सामूहिक रूप से ‘चौपड़ा’ कहा जाता है:
मेघ सागर
प्रेम सागर
साम सागर
रतन सागर
अनंत सागर
5. इस सम्प्रदाय का नाम ‘निष्कलंक’ क्यों पड़ा?
श्रीकृष्ण एवं उनके दूसरे रूप ‘निष्कलंक’ को अपना आराध्य मानने के कारण यह संप्रदाय ‘निष्कलंक’ कहलाता है।
6. इस सम्प्रदाय की कौन-सी विशेष परंपरा है?
इस सम्प्रदाय में रासलीला को विशेष महत्व दिया गया है। रासलीला के माध्यम से भक्ति भावना का प्रसार किया जाता है।