(विस्तृत जीवन परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व)
जन्म एवं परिवार
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जन्मस्थान: कोलूमंड (वर्तमान जोधपुर जिले का फलौदी क्षेत्र)
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वंश: राठौड़ राजपूत
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पिता: धाँधल जी (माखण माड़ी के राव घुंढल के छोटे भाई)
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माता: कमलादे
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पत्नी: फूलमदे / सुप्यारदे (अमरकोट के सोढा राजपूत सूरजमल की पुत्री)
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सहयोगी: चापलोजी (भील बंधु)
वीरगति एवं ऐतिहासिक घटनाएँ
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विवाह के समय बीच में लौटना:
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3 फेरों के बाद गायों की रक्षा हेतु विवाह छोड़कर चले गए।
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मृत्यु: देचू (फलौदी) गाँव में जींदराव खींची (जीजा) से युद्ध करते हुए शहीद हुए।
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मेला: चैत्र अमावस्या को पाबूजी की पूजा विशेष रूप से की जाती है।
धार्मिक महत्व एवं विशेषताएँ
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अवतार: लक्ष्मण का अवतार माने जाते हैं।
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ऊँटों के रक्षक: राईका/रैबारी/देवासी समाज के मुख्य देवता।
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प्लेगरक्षक: मान्यता है कि पाबूजी प्लेग से बचाते हैं।
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गुजरात के सात थोरी भाइयों की रक्षा: ऊँट चोरी से बचाने का प्रसंग प्रसिद्ध है।
सांस्कृतिक विरासत
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फड़ बाँचना:
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भील भोपे “रावणहत्था” वाद्य के साथ पाबूजी की फड़ (कथाचित्र) गाते हैं।
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पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय मानी जाती है।
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पवाड़े (लोकगाथाएँ):
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“माट” (मृदंग) वाद्य के साथ गाई जाती हैं।
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प्रमुख साहित्य:
| पुस्तक | रचनाकार |
|---|---|
| पाबू प्रकाश | आसिया मोड़जी |
| पाबूजी रा छंद | बीठू मेहाजी |
| पाबूजी रा रूपक | मोतीसर बगतावर |
| पाबूजी रा दूहा | लघराज |
| पाबूजी रा सोरठा | रामनाथ |
| पाबूजी रा गीत | बांकीदास |
प्रतीक एवं विशेष उल्लेख
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घोड़ी: केसर कालमी (देवल नामक चारण महिला से संबंधित)।
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मुख्य उपासक समुदाय:
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रैबारी (ऊँट पालक), भील, देवासी।
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लोककला:
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फड़ चित्रण में लाल-पीले रंग का प्रमुखता से उपयोग।
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राजस्थान में पाबूजी का प्रभाव
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मेले: कोलूमंड (फलौदी) में चैत्र अमावस्या पर विशाल जनसमूह।
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लोक नाट्य: “पाबूजी री फड़” में उनकी वीरगाथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।
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कृषि संस्कृति: पशुधन (विशेषकर ऊँटों) की रक्षा हेतु पूजा।
पाबूजी: राजस्थान की लोकआस्था के अमर प्रतीक!
“धरती री राख, पाबू री साख!”
(राजस्थानी कहावत: पाबूजी की प्रतिष्ठा धरती जितनी पवित्र है)।