पाबूजी: राजस्थान के ऊँट रक्षक लोकदेवता

(विस्तृत जीवन परिचय एवं सांस्कृतिक महत्व)

जन्म एवं परिवार

  • जन्मस्थान: कोलूमंड (वर्तमान जोधपुर जिले का फलौदी क्षेत्र)

  • वंश: राठौड़ राजपूत

    • पिता: धाँधल जी (माखण माड़ी के राव घुंढल के छोटे भाई)

    • माता: कमलादे

    • पत्नी: फूलमदे / सुप्यारदे (अमरकोट के सोढा राजपूत सूरजमल की पुत्री)

  • सहयोगी: चापलोजी (भील बंधु)

वीरगति एवं ऐतिहासिक घटनाएँ

  • विवाह के समय बीच में लौटना:

    • 3 फेरों के बाद गायों की रक्षा हेतु विवाह छोड़कर चले गए।

  • मृत्यु: देचू (फलौदी) गाँव में जींदराव खींची (जीजा) से युद्ध करते हुए शहीद हुए।

  • मेला: चैत्र अमावस्या को पाबूजी की पूजा विशेष रूप से की जाती है।

धार्मिक महत्व एवं विशेषताएँ

  1. अवतार: लक्ष्मण का अवतार माने जाते हैं।

  2. ऊँटों के रक्षक: राईका/रैबारी/देवासी समाज के मुख्य देवता।

  3. प्लेगरक्षक: मान्यता है कि पाबूजी प्लेग से बचाते हैं।

  4. गुजरात के सात थोरी भाइयों की रक्षा: ऊँट चोरी से बचाने का प्रसंग प्रसिद्ध है।

सांस्कृतिक विरासत

  • फड़ बाँचना:

    • भील भोपे “रावणहत्था” वाद्य के साथ पाबूजी की फड़ (कथाचित्र) गाते हैं।

    • पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय मानी जाती है।

  • पवाड़े (लोकगाथाएँ):

    • माट” (मृदंग) वाद्य के साथ गाई जाती हैं।

प्रमुख साहित्य:

पुस्तक रचनाकार
पाबू प्रकाश आसिया मोड़जी
पाबूजी रा छंद बीठू मेहाजी
पाबूजी रा रूपक मोतीसर बगतावर
पाबूजी रा दूहा लघराज
पाबूजी रा सोरठा रामनाथ
पाबूजी रा गीत बांकीदास

प्रतीक एवं विशेष उल्लेख

  • घोड़ी: केसर कालमी (देवल नामक चारण महिला से संबंधित)।

  • मुख्य उपासक समुदाय:

    • रैबारी (ऊँट पालक), भील, देवासी

  • लोककला:

    • फड़ चित्रण में लाल-पीले रंग का प्रमुखता से उपयोग।

राजस्थान में पाबूजी का प्रभाव

  • मेले: कोलूमंड (फलौदी) में चैत्र अमावस्या पर विशाल जनसमूह।

  • लोक नाट्य: “पाबूजी री फड़” में उनकी वीरगाथाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।

  • कृषि संस्कृति: पशुधन (विशेषकर ऊँटों) की रक्षा हेतु पूजा।

पाबूजी: राजस्थान की लोकआस्था के अमर प्रतीक!

                                                                                         “धरती री राख, पाबू री साख!”

 (राजस्थानी कहावत: पाबूजी की प्रतिष्ठा धरती जितनी पवित्र है)।

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