भारतीय उपमहाद्वीप की वर्तमान भू-वैज्ञानिक संरचना और इसके सक्रिय भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ मुख्य रूप से अंतर्जनित व बहिर्जनित बलों तथा टेक्टोनिक प्लेटों के क्षैतिज संचलन की परस्पर अंतःक्रिया के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आई हैं। इसी जटिल भूवैज्ञानिक इतिहास की छाप राजस्थान के विविध भू-दृश्यों पर स्पष्ट देखी जा सकती है।
राजस्थान को भौगोलिक प्रदेशों में विभाजित करने का महत्वपूर्ण कार्य प्रो. वी.सी. मिश्रा तथा डॉ. आर.एल. सिंह (रामलोचन सिंह) ने किया। संरचनात्मक दृष्टि से राजस्थान का भौतिक स्वरूप उत्तरी विशाल मैदान एवं प्रायद्वीपीय पठार का हिस्सा है।
प्रमुख वर्गीकरण: एक दृष्टि में
राजस्थान को सामान्यतः चार बृहत् भौगोलिक प्रदेशों में विभक्त किया जाता है:
पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश
अरावली पर्वतीय प्रदेश
पूर्वी मैदानी प्रदेश
दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश
1. पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेश
यह राजस्थान का सबसे बड़ा प्रदेश है, जिसे आगे चार उप-प्रदेशों में बाँटा गया है:
शुष्क रेतीला प्रदेश (मरुस्थलीय): इसमें जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर और जोधपुर का पश्चिमी भाग शामिल है। यह थार मरुस्थल का केंद्रीय भाग है, जहाँ बालू के विशाल टीले, अत्यधिक शुष्क जलवायु और न्यून वर्षा (15-25 सेमी.) पाई जाती है।
लूनी-जवाई का मैदान (लूनी बेसिन): यह लूनी नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित एक अर्ध-सूखा मैदान है, जो पाली, जोधपुर और बाड़मेर के हिस्सों में फैला है।
शेखावाटी प्रदेश (बांगर प्रदेश): झुन्झुनूं, सीकर और चूरु के क्षेत्र को कवर करता है। यहाँ पुराने जलोढ़ निक्षेप (बांगर) और अर्ध-शुष्क परिस्थितियाँ (वार्षिक वर्षा 25-30 सेमी.) मिलती हैं।
घग्घर का मैदान: यह श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जिले में स्थित है। प्राचीन सरस्वती (घग्घर) नदी द्वारा निर्मित यह उपजाऊ मैदान राजस्थान के “नहरी प्रदेश” का आधार है, जो इंदिरा गांधी नहर से सिंचित होकर कृषि-समृद्ध बन गया है।
2. अरावली पर्वतीय प्रदेश
दुनिया की प्राचीनतम पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, अरावली, राजस्थान को दो भागों में विभाजित करती है। इसे तीन उप-खंडों में देखा जाता है:
उत्तरी अरावली: यह दिल्ली के निकट रायसीना पहाड़ियों से शुरू होकर अलवर, जयपुर तक फैली निम्न पहाड़ियों और संकीर्ण श्रृंखलाओं का क्षेत्र है।
मध्य अरावली: अजमेर, पाली, नागौर और जोधपुर के कुछ भागों में विस्तृत यह खंड अधिक स्पष्ट पहाड़ी स्वरूप प्रस्तुत करता है।
दक्षिणी अरावली: यह सबसे ऊँचा, चौड़ा और विस्तृत भाग है, जो उदयपुर, सिरोही और डूंगरपुर में फैला है। यहाँ राज्य की सबसे ऊँची चोटियाँ—गुरु शिखर (सिरोही) और सेर (सिरोही)—स्थित हैं। यह क्षेत्र अपेक्षाकृत अधिक वर्षा और घने वनों के लिए जाना जाता है।
3. पूर्वी मैदानी प्रदेश
अरावली के पूर्व में स्थित यह प्रदेश उपजाऊ नदी-मैदानों से बना है, जिसे तीन भागों में बाँटा जा सकता है:
बनास बेसिन: भीलवाड़ा, टोंक, अजमेर और सवाई माधोपुर के हिस्सों में फैला यह मैदान बनास नदी और उसकी सहायक नदियों (बेड़च, मेनाल, कोठारी आदि) द्वारा निर्मित है।
चंबल बेसिन: यह कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर और धौलपुर से होकर बहने वाली चंबल नदी द्वारा निर्मित मैदान है। इसका एक बड़ा हिस्सा नदी द्वारा कटाव से बने बीहड़ों (रावी भूमि) के लिए कुख्यात है, जिसे “चंबल बीहड़ प्रदेश” भी कहा जाता है।
मध्य माही बेसिन (छप्पन का मैदान): बाँसवाड़ा और प्रतापगढ़ में स्थित यह मैदान माही नदी द्वारा निर्मित एक संकरा लेकिन उपजाऊ क्षेत्र है। यह “दक्षिणी-पूर्वी कृषि प्रदेश” का हिस्सा है, जहाँ वर्षा 50 सेमी. से अधिक होती है।
4. दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेश
यह प्रदेश विंध्यन और दक्कन लावा पठार का उत्तरी विस्तार है, जो जटिल भू-आकृतियों से भरपूर है:
अर्द्ध-चंद्राकार पर्वत श्रेणियाँ: इसमें भैंसरोड़गढ़, गंगरार, ओगना आदि की पहाड़ियाँ शामिल हैं।
नदी-निर्मित मैदान: माही और उसकी सहायक नदियों द्वारा बनाए गए छोटे-छोटे उपजाऊ मैदान।
शाहबाद का उच्च स्थल: बाराँ जिले में स्थित यह एक ऊँचा, समतल पठारी इलाका है।
झालावाड़ का पठार: लावा निर्मित यह काली मिट्टी वाला पठार कपास की खेती के लिए प्रसिद्ध है।
डग-गंगधार के उच्च प्रदेश: झालावाड़ में स्थित यह एक पहाड़ी और वनाच्छादित क्षेत्र है।
निष्कर्ष
प्रो. मिश्रा और डॉ. सिंह के वर्गीकरण से स्पष्ट है कि राजस्थान की भू-आकृतिक विविधता अद्वितीय है। एक ओर जहाँ पश्चिम में शुष्क मरुस्थल है, तो दूसरी ओर पूर्व में हरा-भरा नदी मैदान; एक तरफ प्राचीन, टूटी-फूटी अरावली की पहाड़ियाँ हैं, तो दूसरी तरफ दक्षिण-पूर्व में ऊँचे पठार। यह विविधता ही इस राज्य की प्राकृतिक, कृषिगत और सांस्कृतिक विरासत का मूल आधार है। राजस्थान का भूगोल सिर्फ रेत और पहाड़ों का नहीं, बल्कि नदियों, मैदानों और पठारों का एक सुंदर समन्वय है।