1178 ई. का कायादरा युद्ध: गोरी की पहली बड़ी हार और भारत का विस्मृत विजय अध्याय

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भारतीय इतिहास में तराइन और चंदावर के युद्धों का तो खूब जिक्र होता है, लेकिन एक ऐसा युद्ध भी है जिसने मोहम्मद गोरी को पहली बार बुरी तरह धूल चटाई थी और उसके भारत विजय के सपनों को कई सालों के लिए स्थगित कर दिया था। यह था 1178 ई. का कायादरा (या कासहड़ा) का युद्ध – एक ऐसी निर्णायक जीत जिसका श्रेय गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक मूलराज द्वितीय (भीमदेव द्वितीय) और उनकी वीर सेना को जाता है।

पृष्ठभूमि: गोरी की महत्वाकांक्षा और भारत का प्रवेश द्वार

1173 ई. में ग़ज़नी का सुल्तान बनने के बाद, मोहम्मद गोरी ने अपने भाई की नीति को आगे बढ़ाते हुए भारत पर आक्रमण का सिलसिला शुरू किया। उसका लक्ष्य सिर्फ लूटपाट नहीं, बल्कि स्थायी साम्राज्य स्थापित करना था। पंजाब के मुल्तान और उच्छ पर कब्जा करने के बाद, उसने सबसे समृद्ध माने जाने वाले क्षेत्र पर निशाना साधा – गुजरात का चालुक्य साम्राज्य। गुजरात उस समय व्यापार, संपदा और सैन्य शक्ति में अग्रणी था। गोरी ने सोचा कि अगर इस मजबूत राज्य को जीत लिया, तो दक्षिण और पूर्व के रास्ते खुल जाएंगे।

दूसरी ओर, गुजरात पर मूलराज द्वितीय (भीमदेव द्वितीय) का शासन था। हालाँकि वह एक नाबालिग थे, लेकिन उनकी माँ रानी नायिकादेवी (कुछ स्रोतों में उन्हें ही शासक बताया गया है) एक कुशल शासिका और रणनीतिज्ञ थीं। उन्होंने गोरी के खतरे को भांप लिया और सेना की कमान एक अनुभवी सेनापति के हाथ में सौंपकर पूरी तैयारी कर ली।

मोर्चा: दो सेनाओं का सामना

गोरी की सेना:

  • मुख्य रूप से घुड़सवार तीरंदाजों और भारी घुड़सवारों से लैस एक मोबाइल सेना।

  • लंबी दूरी तय करके आई थी, इसलिए थकी हुई और स्थानीय भूगोल से अनभिज्ञ।

  • उनका मनोबल ऊँचा था क्योंकि वे पहले के छापामार हमलों में सफल रहे थे।

चालुक्य सेना:

  • गुजरात की स्थायी और विशाल सेना, जिसमें शक्तिशाली हाथी दल और अच्छी तरह से सज्जित पैदल सेना शामिल थी।

  • स्थानीय भूगोल (पहाड़ियाँ और संकरे रास्ते) का पूरा ज्ञान।

  • देशभक्ति और अपनी भूमि की रक्षा की प्रबल भावना से प्रेरित।

युद्ध का स्थल और घटनाक्रम

यह युद्ध आधुनिक गुजरात के सिरोही जिले के पास कायादरा (कासहड़ा) नामक स्थान पर लड़ा गया। यह इलाका पहाड़ियों और संकरे मार्गों से भरा था, जो चालुक्य सेना के लिए एक आदर्श रक्षात्मक स्थिति प्रदान करता था।

गोरी ने थार के रेगिस्तान को पार करके सीधे आबू पर्वत के रास्ते गुजरात पर हमला बोला। चालुक्य सेना ने इसी रास्ते में घात लगाकर हमला करने की रणनीति बनाई। जब गोरी की सेना थकीहारी और अनजान इलाके में आगे बढ़ रही थी, तभी चालुक्य सेना ने अचानक जोरदार हमला बोल दिया।

चालुक्य रणनीति के प्रमुख बिंदु:

  1. भूगोल का फायदा: संकरे रास्तों ने गोरी की घुड़सवार सेना की गतिशीलता को सीमित कर दिया।

  2. हाथी दल का प्रभाव: चालुक्य हाथियों ने गोरी के घोड़ों में भगदड़ मचा दी, जिससे उनकी युद्ध रेखा टूट गई।

  3. घेराव और आक्रमण: स्थानीय सैनिकों ने घुमावदार रास्तों से आकर गोरी की सेना को चारों ओर से घेर लिया।

युद्ध अत्यंत भीषण रहा। गोरी की सेना पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई। कहा जाता है कि गोरी स्वयं मुश्किल से अपनी जान बचाकर थोड़े से सैनिकों के साथ भागने में सफल हुआ। उसे अपना सारा सामान और लूट छोड़कर वापस ग़ज़नी की ओर भागना पड़ा।

युद्ध के तात्कालिक और दीर्घकालिक परिणाम

तात्कालिक परिणाम:

  • गोरी की भारी पराजय: यह गोरी के भारत अभियान की पहली और सबसे बड़ी हार थी।

  • गुजरात की सुरक्षा: चालुक्य साम्राज्य सुरक्षित रहा और उसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।

  • गोरी की रणनीति में बदलाव: इस हार ने गोरी को सबक सिखाया। उसने अगले कई सालों तक गुजरात की ओर रुख नहीं किया और अपना ध्यान पंजाब और दिल्ली-अजमेर क्षेत्र की ओर केंद्रित किया, जहाँ उसे अपेक्षाकृत कमजोर प्रतिरोध की उम्मीद थी।

दीर्घकालिक ऐतिहासिक महत्व:

  1. समय की प्राप्ति: इस युद्ध ने भारत को लगभग 14-15 साल का कीमती समय दिया। अगर गोरी 1178 में ही सफल हो जाता, तो भारत का इतिहास शायद अलग होता।

  2. रणनीतिक मोड़: गोरी ने इस हार से सीख लेते हुए दिल्ली और अजमेर पर ध्यान दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1191-92 में पृथ्वीराज चौहान के साथ तराइन का युद्ध हुआ।

  3. एक विस्मृत विजय: यह युद्ध इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसे अक्सर इतिहास की मुख्यधारा में उचित स्थान नहीं मिला। यह साबित करता है कि भारतीय शासक सक्षम थे और उन्होंने आक्रमणकारियों को कड़ी चुनौती दी थी।

निष्कर्ष

कायादरा का युद्ध केवल एक सैन्य झड़प नहीं था; यह एक रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक जीत थी। इसने गोरी की अजेयता की भ्रांति को तोड़ा और दिखाया कि स्थानीय ज्ञान, सही रणनीति और दृढ़ संकल्प से किसी बड़े आक्रमणकारी को हराया जा सकता है। यदि इस जीत के बाद के वर्षों में उत्तरी भारत के राज्यों ने समान एकजुटता दिखाई होती, तो शायद इतिहास कुछ और ही होता। फिर भी, 1178 की यह विजय भारतीय सैन्य इतिहास का एक गौरवशाली, यद्यपि कम चर्चित, अध्याय बनी हुई है।


कायादरा युद्ध से जुड़े 5 प्रमुख प्रश्नोत्तर (FAQs)

1. कायादरा युद्ध किसके बीच हुआ था?
यह युद्ध गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) साम्राज्य (शासक: मूलराज द्वितीय/भीमदेव द्वितीय, जिनकी माँ रानी नायिकादेवी ने संभवतः नेतृत्व किया) और ग़ज़नी के शासक मोहम्मद गोरी की सेनाओं के बीच लड़ा गया था।

2. यह युद्ध कहाँ हुआ था?
यह युद्ध वर्तमान गुजरात के सिरोही जिले के निकट कायादरा (या कासहड़ा) नामक स्थान पर हुआ। यह स्थान आबू पर्वत के मार्ग में पड़ता है, जो थार के रेगिस्तान को पार करने के बाद गुजरात में प्रवेश का एक रास्ता था।

3. इस युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम क्या था?
सबसे महत्वपूर्ण परिणाम मोहम्मद गोरी की पहली बड़ी और शर्मनाक हार थी। इसने उसकी भारत विजय की योजनाओं में कई सालों की देरी कर दी और उसे अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर किया। उसने गुजरात से ध्यान हटाकर पंजाब और दिल्ली-अजमेर क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया।

4. चालुक्य सेना की मुख्य रणनीति क्या थी जिससे उन्हें जीत मिली?
चालुक्य सेना ने स्थानीय भूगोल के ज्ञान का पूरा फायदा उठाया। उन्होंने पहाड़ियों और संकरे रास्तों में घात लगाकर गोरी की सेना पर हमला किया। इसके अलावा, उनके शक्तिशाली हाथी दल ने गोरी की घुड़सवार सेना में भगदड़ मचा दी, जो ऐसे इलाके में फंस गई थी और प्रभावी ढंग से मोर्चा नहीं संभाल पाई।

5. क्या यह युद्ध इतिहास में कम चर्चित क्यों है?
इसके कई कारण हैं:

  • बाद की घटनाओं की भारी छाया: तराइन (1191-92) और चंदावर (1194) के युद्धों, जिनमें गोरी को जीत मिली, ने इस पहली हार को ऐतिहासिक विमर्श से हटा दिया।

  • दीर्घकालिक प्रभाव की कमी: हालाँकि इसने गोरी को रोका, लेकिन इसने उसके अभियान को स्थायी रूप से नहीं रोका। गोरी ने दूसरे मोर्चे से हमला करके अंततः सफलता प्राप्त की।

  • इतिहास लेखन: प्रारंभिक इतिहास लेखन अक्सर दिल्ली केंद्रित रहा है, जिसमें उत्तर-पश्चिम के युद्धों को अधिक स्थान मिला, जबकि गुजरात की इस विजय का उल्लेख कम हुआ।

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