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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: एक दुर्गम गढ़ की चुनौती
13वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में दिल्ली सल्तनत के विस्तार का दौर चरम पर था। अलाउद्दीन खिलजी, जो 1296 ई. में दिल्ली की गद्दी पर बैठा था, अपनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के तहत राजस्थान के स्वतंत्र हिंदू राज्यों को जीतने में लगा हुआ था। इसी क्रम में उसकी नजर रणथंभौर पर पड़ी – एक अजेय माने जाने वाला किला जो चट्टानी पहाड़ी पर स्थित था और अपनी प्राकृतिक सुरक्षा के लिए प्रसिद्ध था।
उस समय रणथंभौर पर हम्मीर देव चौहान का शासन था। वह चौहान वंश का एक साहसी और दृढ़निश्चयी शासक था, जिसने अपने शासनकाल में रणथंभौर की शक्ति को पुनर्जीवित किया था। हम्मीर देव न केवल एक कुशल शासक था बल्कि उसने अपने दरबार में उन मुस्लिम सरदारों को भी शरण दी थी जो अलाउद्दीन खिलजी के अत्याचारों से बचकर भागे थे। यही बात अलाउद्दीन के लिए सीधी चुनौती बन गई।
युद्ध का कारण: एक राजनीतिक चुनौती
रणथंभौर युद्ध के प्रमुख कारण थे:
शरणार्थी मामला: हम्मीर देव ने अलाउद्दीन के भतीजे और कुछ अन्य मुगल सरदारों को शरण दी थी जो खिलजी से असंतुष्ट थे
सामरिक महत्व: रणथंभौर का किला दिल्ली से मालवा और गुजरात जाने वाले मार्ग पर नियंत्रण रखता था
स्वतंत्रता का प्रतीक: हम्मीर देव की स्वतंत्र नीति दिल्ली सल्तनत के विस्तार में बाधक थी
आर्थिक लालच: रणथंभौर एक समृद्ध राज्य था जिसकी संपदा पर खिलजी की नजर थी
अलाउद्दीन ने पहले हम्मीर देव को संदेश भेजकर शरणार्थियों को सौंपने और आत्मसमर्पण करने की मांग की। हम्मीर देव ने इस मांग को ठुकरा दिया और युद्ध के लिए तैयार हो गया।
रणथंभौर की सैन्य तैयारी
हम्मीर देव ने रणथंभौर की रक्षा के लिए विस्तृत तैयारियाँ कीं:
किले की सुरक्षा:
रणथंभौर का किला प्राकृतिक रूप से सुरक्षित था – तीन ओर से खड़ी चट्टानें और एक ओर गहरी खाई
किले की दीवारों को मजबूत किया गया
आवश्यक संसाधनों का भंडारण किया गया
सेना का संगठन:
राजपूत योद्धाओं की एक अनुभवी सेना
स्थानीय भील जनजाति के धनुर्धर जो पहाड़ी इलाके में युद्ध में माहिर थे
पर्याप्त मात्रा में शस्त्रास्त्र और युद्ध सामग्री
रणनीतिक योजना:
पहाड़ी रास्तों में घात लगाकर हमले की योजना
किले के आसपास के इलाके का पूरा ज्ञान का उपयोग
दुश्मन की रसद लाइनों पर हमले की तैयारी
खिलजी की सेना और रणनीति
अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सेनापति नुसरत खाँ और उलुग खाँ की कमान में एक विशाल सेना रणथंभौर भेजी। इस सेना में शामिल थे:
सेना संरचना:
अनुभवी घुड़सवार सैनिक
विशेष प्रशिक्षित पैदल सेना
घेराबंदी के हथियार और मंगोनल (तोप के पूर्ववर्ती)
इंजीनियर और खान खोदने वाले विशेषज्ञ
खिलजी की रणनीति:
लंबी घेराबंदी की योजना
किले की दीवारों के नीचे सुरंगें बनाकर उन्हें कमजोर करना
मनोवैज्ञानिक युद्ध – आतंक फैलाना
संसाधनों को कमजोर करने के लिए आसपास के क्षेत्रों पर नियंत्रण
युद्ध का घटनाक्रम: एक लंबा संघर्ष
प्रारंभिक चरण (घेराबंदी):
1299 ई. में खिलजी की सेना ने रणथंभौर के किले को घेर लिया। प्रारंभ में हम्मीर देव की सेना ने किले से ही मोर्चा संभाला और दुश्मन पर तीरों और पत्थरों की बौछार की।
मध्य चरण (सक्रिय प्रतिरोध):
राजपूत योद्धाओं ने रात के अंधेरे में छापामार हमले किए
भील धनुर्धरों ने पहाड़ियों से छिपकर खिलजी सैनिकों पर हमले किए
दुश्मन की रसद लाइनों को नुकसान पहुँचाया गया
निर्णायक चरण (किले की घेराबंदी):
कई महीनों की घेराबंदी के बाद खिलजी की सेना ने किले की दीवारों के नीचे सुरंगें बनाकर उन्हें कमजोर करना शुरू किया। हालाँकि, हम्मीर देव के सैनिकों ने इन सुरंगों का पता लगाकर उन्हें नष्ट करने का प्रयास किया।
भीषण संघर्ष:
जब खिलजी की सेना ने किले पर सीधा हमला किया तो भीषण युद्ध हुआ। राजपूत योद्धाओं ने किले के प्रवेश द्वारों पर डटकर मुकाबला किया। हाथियों का उपयोग करके दुश्मन के हाथी दल का सामना किया गया।
अंतिम संघर्ष और जौहर
कई महीनों की घेराबंदी के बाद जब स्थिति निराशाजनक हो गई और किले के अंदर भोजन व पानी की कमी होने लगी, तो हम्मीर देव ने अंतिम निर्णय लिया।
जौहर की तैयारी:
राजपूत महिलाओं ने जौहर के लिए तैयारी शुरू की
विशाल चिता सजाई गई
सभी महिलाएँ और बच्चे किले के अंदर एकत्र हुए
साका (अंतिम युद्ध):
जौहर के बाद शेष राजपूत योद्धाओं ने केसरिया वस्त्र धारण किए और किले के द्वार खोल दिए। वे दुश्मन पर टूट पड़े जानते हुए कि यह उनका अंतिम युद्ध है।
हम्मीर देव का अंत:
हम्मीर देव स्वयं युद्धभूमि में उतरे और अंतिम सांस तक लड़ते रहे। ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, वह वीरतापूर्वक लड़ते हुए मारे गए।
युद्ध के परिणाम और ऐतिहासिक महत्व
तात्कालिक परिणाम:
रणथंभौर का किला खिलजी के कब्जे में आ गया
हम्मीर देव चौहान और अधिकांश राजपूत योद्धा मारे गए
किले को लूटा गया और उसकी संपदा दिल्ली भेजी गई
रणथंभौर दिल्ली सल्तनत का एक प्रांत बन गया
ऐतिहासिक महत्व:
प्रतिरोध का प्रतीक: हम्मीर देव का प्रतिरोध राजपूत शौर्य का प्रतीक बना
रणथंभौर की प्रतिष्ठा: इस युद्ध ने रणथंभौर की अजेयता की प्रतिष्ठा को चुनौती दी
खिलजी की रणनीति: इस युद्ध ने खिलजी की घेराबंदी रणनीति की प्रभावशीलता सिद्ध की
राजस्थान के इतिहास में मोड़: इसके बाद राजस्थान के अधिकांश किले खिलजी के निशाने पर आ गए
सैन्य सबक:
घेराबंदी युद्ध में संसाधनों का महत्व
प्राकृतिक सुरक्षा के बावजूद तैयारी की आवश्यकता
रसद लाइनों की सुरक्षा का महत्व
मनोबल का युद्ध में निर्णायक योगदान
स्मृति और विरासत
रणथंभौर युद्ध की स्मृति आज भी जीवित है:
लोक साहित्य: राजस्थानी लोकगाथाओं और कविताओं में हम्मीर देव की वीरता का गुणगान
ऐतिहासिक ग्रंथ: हम्मीर रासो और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों में विस्तृत वर्णन
सांस्कृतिक प्रभाव: यह युद्ध राजपूत शौर्य और बलिदान की परंपरा का हिस्सा बन गया
पर्यटन स्थल: आज रणथंभौर किला एक प्रमुख पर्यटन स्थल है जहाँ इस युद्ध की यादें संजोई हुई हैं
निष्कर्ष
1299 ई. का रणथंभौर युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह न केवल एक सैन्य संघर्ष था बल्कि दो विचारधाराओं – स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद के बीच का टकराव था। हम्मीर देव चौहान ने जिस साहस और दृढ़ता से रणथंभौर की रक्षा की, वह भारतीय इतिहास में स्वाभिमान और बलिदान का एक उज्ज्वल उदाहरण है। यद्यपि इस युद्ध में हम्मीर देव की पराजय हुई, लेकिन उनका प्रतिरोध इतिहास में अमर हो गया। यह युद्ध हमें सिखाता है कि कभी-कभी युद्ध के मैदान में हार जाने के बाद भी नैतिक विजय प्राप्त की जा सकती है और एक व्यक्ति का बलिदान पूरी पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।
रणथंभौर युद्ध से जुड़े 5 प्रमुख प्रश्नोत्तर (FAQs)
1. 1299 ई. में रणथंभौर युद्ध किसके बीच हुआ था?
यह युद्ध रणथंभौर के चौहान शासक हम्मीर देव चौहान और दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की सेना के बीच लड़ा गया। खिलजी की सेना का नेतृत्व नुसरत खाँ और उलुग खाँ कर रहे थे।
2. इस युद्ध का मुख्य कारण क्या था?
मुख्य कारण था हम्मीर देव द्वारा खिलजी के विद्रोही भतीजे और अन्य मुस्लिम सरदारों को शरण देना। जब अलाउद्दीन ने इन शरणार्थियों को सौंपने की मांग की तो हम्मीर देव ने इनकार कर दिया, जिससे युद्ध छिड़ गया।
3. रणथंभौर का किला क्यों अजेय माना जाता था?
रणथंभौर का किला प्राकृतिक रूप से सुरक्षित था:
तीन ओर से खड़ी चट्टानें
एक ओर गहरी खाई
पहाड़ी पर स्थित होने के कारण दुर्गम
सीमित प्रवेश मार्ग जिनकी रक्षा आसान थी
4. इस युद्ध में हम्मीर देव की रणनीति क्या थी?
हम्मीर देव की रणनीति में शामिल था:
लंबी घेराबंदी के लिए तैयारी
छापामार हमले करना
दुश्मन की रसद लाइनों को नष्ट करना
किले की प्राकृतिक सुरक्षा का पूरा उपयोग
स्थानीय भील जनजाति के धनुर्धरों का सहयोग
5. इस युद्ध का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
इस युद्ध का ऐतिहासिक महत्व है:
यह अलाउद्दीन खिलजी की राजस्थान विजय का महत्वपूर्ण चरण था
इसने राजपूताना में दिल्ली सल्तनत के प्रभाव को स्थापित किया
हम्मीर देव का प्रतिरोध राजपूत शौर्य का प्रतीक बना
इस युद्ध ने घेराबंदी युद्ध के महत्व को उजागर किया
यह मध्यकालीन भारत में साम्राज्यवाद और स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक है