(विशेष रूप से राजस्थानी संस्कृति में)
कृष्ण पक्ष (श्राद्ध पक्ष)
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सांसी (पार्वती) पूजा
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16 दिनों तक चलने वाली अनूठी परम्परा
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नायद्वारा (नाथद्वारा) में केले की सांसी बनाई जाती है
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सामान्यतः मिट्टी + गोबर से सांसी की प्रतिमा बनाकर पूजा
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मत्स्येन्द्रनाथ मंदिर (उदयपुर) को “सांसी का मंदिर” कहा जाता है
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अंतिम दिन थम्बुड़ा व्रत (एक विशेष अनुष्ठान) किया जाता है
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शुक्ल पक्ष (उत्सव पक्ष)
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प्रतिपदा (एकम)
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शरद नवरात्रि प्रारंभ
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9 दिनों तक दुर्गा पूजा एवं गरबा-रास
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अष्टमी
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दुर्गाष्टमी (माँ दुर्गा की पूजा)
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होमाष्टमी (यज्ञ अनुष्ठान)
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दशमी – विजयादशमी (दशहरा)
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कोटा का दशहरा मेला प्रसिद्ध (महाराव उम्मेद सिंह के काल से)
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विशेष परम्पराएँ:
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हथियारों की पूजा (राजपूत शस्त्र पूजन)
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टीका दौड़ (छोटा युद्ध जैसा आयोजन)
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खेजड़ी वृक्ष की पूजा (राजस्थान का कल्पवृक्ष)
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लीलटांस पक्षी के दर्शन शुभ माने जाते हैं
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कवि कन्हैयालाल सेठिया की प्रसिद्ध रचना “लीलटांस” से जुड़ाव
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पूर्णिमा – शरद पूर्णिमा (रास पूर्णिमा)
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मान्यता: इस रात चन्द्रमा की किरणों में अमृत होता है
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रासलीला का आयोजन (भगवान कृष्ण की लीलाओं का मंचन)
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प्रमुख मेले एवं महोत्सव
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मारवाड़ी (मांड) महोत्सव (जोधपुर)
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राजस्थानी लोक संगीत और मांड गायन की प्रस्तुतियाँ
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स्थानीय कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम
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मीरा महोत्सव (चित्तौड़गढ़)
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संत मीराबाई की भक्ति रचनाओं पर आधारित
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भजन-कीर्तन और सामूहिक आरती
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विशेष तथ्य
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लीलटांस पक्षी:
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राजस्थान में इसे शुभ संकेत माना जाता है, विशेषकर दशहरे पर।
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सेठिया जी की कविता में यह पक्षी प्रेम और विरह का प्रतीक है।
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खेजड़ी पूजा:
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राजस्थान का राज्य वृक्ष, जिसे “गरीबों का कल्पवृक्ष” कहते हैं।
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थम्बुड़ा व्रत:
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सांसी पूजा के अंत में किया जाने वाला अनुष्ठान, जिसमें मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता है।
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आश्विन मास राजस्थान में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक धूमधाम का संगम है!