आश्विन मास के त्योहार एवं परम्पराएँ

(विशेष रूप से राजस्थानी संस्कृति में)

कृष्ण पक्ष (श्राद्ध पक्ष)

  1. सांसी (पार्वती) पूजा

    • 16 दिनों तक चलने वाली अनूठी परम्परा

    • नायद्वारा (नाथद्वारा) में केले की सांसी बनाई जाती है

    • सामान्यतः मिट्टी + गोबर से सांसी की प्रतिमा बनाकर पूजा

    • मत्स्येन्द्रनाथ मंदिर (उदयपुर) को “सांसी का मंदिर” कहा जाता है

    • अंतिम दिन थम्बुड़ा व्रत (एक विशेष अनुष्ठान) किया जाता है

शुक्ल पक्ष (उत्सव पक्ष)

  1. प्रतिपदा (एकम)

    • शरद नवरात्रि प्रारंभ

    • 9 दिनों तक दुर्गा पूजा एवं गरबा-रास

  2. अष्टमी

    • दुर्गाष्टमी (माँ दुर्गा की पूजा)

    • होमाष्टमी (यज्ञ अनुष्ठान)

  3. दशमी – विजयादशमी (दशहरा)

    • कोटा का दशहरा मेला प्रसिद्ध (महाराव उम्मेद सिंह के काल से)

    • विशेष परम्पराएँ:

      • हथियारों की पूजा (राजपूत शस्त्र पूजन)

      • टीका दौड़ (छोटा युद्ध जैसा आयोजन)

      • खेजड़ी वृक्ष की पूजा (राजस्थान का कल्पवृक्ष)

      • लीलटांस पक्षी के दर्शन शुभ माने जाते हैं

        • कवि कन्हैयालाल सेठिया की प्रसिद्ध रचना “लीलटांस” से जुड़ाव

  4. पूर्णिमा – शरद पूर्णिमा (रास पूर्णिमा)

    • मान्यता: इस रात चन्द्रमा की किरणों में अमृत होता है

    • रासलीला का आयोजन (भगवान कृष्ण की लीलाओं का मंचन)

प्रमुख मेले एवं महोत्सव

  1. मारवाड़ी (मांड) महोत्सव (जोधपुर)

    • राजस्थानी लोक संगीत और मांड गायन की प्रस्तुतियाँ

    • स्थानीय कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम

  2. मीरा महोत्सव (चित्तौड़गढ़)

    • संत मीराबाई की भक्ति रचनाओं पर आधारित

    • भजन-कीर्तन और सामूहिक आरती

विशेष तथ्य

  • लीलटांस पक्षी:

    • राजस्थान में इसे शुभ संकेत माना जाता है, विशेषकर दशहरे पर।

    • सेठिया जी की कविता में यह पक्षी प्रेम और विरह का प्रतीक है।

  • खेजड़ी पूजा:

    • राजस्थान का राज्य वृक्ष, जिसे “गरीबों का कल्पवृक्ष” कहते हैं।

  • थम्बुड़ा व्रत:

    • सांसी पूजा के अंत में किया जाने वाला अनुष्ठान, जिसमें मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता है।

आश्विन मास राजस्थान में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक धूमधाम का संगम है!

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