(पूर्ण जीवन परिचय एवं धार्मिक महत्व)
जन्म एवं परिवार
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जन्मस्थान: ददरेवा (चुरु जिला)
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वंश: चौहान राजपूत
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पिता: जेवर सिंह
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माता: बाछलदे (कुछ स्रोतों में ‘कमलादे’)
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पत्नी: मेनलदे (सिरसा, हरियाणा की राजकुमारी)
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ऐतिहासिक योगदान
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महमूद गजनवी से संघर्ष:
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गजनवी ने इन्हें “जाहिर पीर” (साक्षात देवता) की उपाधि दी।
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वीरगति:
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अपने मौसेरे भाइयों अरजन-सरजन से गायों की रक्षा करते हुए शहीद हुए।
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धार्मिक महत्व
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सर्परक्षक देवता: सांपों के काटने पर इनका नाम लिया जाता है।
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हिंदू-मुस्लिम एकता:
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मुसलमान इन्हें “गोगा पीर” कहकर पूजते हैं।
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गोगामेड़ी मंदिर (हनुमानगढ़) में “बिस्मिल्लाह” लिखा हुआ है।
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प्रतीक:
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खेजड़ी वृक्ष के नीचे मंदिर बनाए जाते हैं।
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नीले झंडे (गोगाजी का प्रतीक) चढ़ाए जाते हैं।
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प्रमुख मंदिर
| स्थान | जिला | विशेषता |
|---|---|---|
| शीर्षमेड़ी | ददरेवा (चुरु) | जन्मस्थान |
| धुरमेड़ी (गोगामेड़ी) | हनुमानगढ़ | मकबरेनुमा मंदिर |
| गोगाजी री ओली | खिलेरियों की ढाणी (सांचौर) | लोक आस्था का केंद्र |
सांस्कृतिक प्रभाव
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मेला: भाद्रपद कृष्ण नवमी को गोगामेड़ी मेला (हनुमानगढ़) आयोजित।
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लोकसाहित्य:
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“गोगाजी रा सावला” (बीठू मेहाजी द्वारा रचित)।
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“गोगा पवाड़ा” (लोकगाथा) में उनकी वीरता का वर्णन।
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कला:
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भोपे “जंतर” (वाद्ययंत्र) बजाकर गोगाजी की कथा सुनाते हैं।
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विशेष तथ्य
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गोगाजी की फड़: चित्रित कपड़े पर उनकी गाथा बाँची जाती है।
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राजस्थान-हरियाणा सीमा पर इनकी पूजा विशेष प्रचलित है।
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मान्यता: गोगाजी के नाम का धागा (गोगा धागा) बाँधने से सर्पदंश से बचाव होता है।
गोगाजी: सांपों के भगवान और साम्प्रदायिक सद्भाव के प्रतीक!
“गोगा धरती, गोगा आकास, गोगा पीर की होय आस!”
(राजस्थानी लोकोक्ति: गोगाजी की कृपा सर्वव्यापी है)।