दादू पंथ सम्प्रदाय

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राजस्थान के सबसे प्रभावशाली और व्यापक आध्यात्मिक आंदोलनों में से एक – दादू पंथ के बारे में। यह निर्गुण भक्ति धारा का एक ऐसा सम्प्रदाय है जिसने न केवल धार्मिक क्षेत्र में बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में भी गहरी छाप छोड़ी है।

प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय

दादू पंथ 16वीं शताब्दी में राजस्थान में उत्पन्न एक प्रमुख निर्गुण भक्ति सम्प्रदाय है जिसने पूरे उत्तर भारत में अपनी पहचान बनाई। यह सम्प्रदाय अपनी सरल शिक्षाओं, सामाजिक समानता के संदेश और गहन आध्यात्मिक दर्शन के लिए जाना जाता है। दादू पंथ ने जाति-पाति के भेदभाव से ऊपर उठकर मानव मात्र की एकता का संदेश दिया और समाज के सभी वर्गों के लोगों को आकर्षित किया।

सम्प्रदाय

दादू पंथ एक ऐसा आध्यात्मिक मार्ग है जो बाहरी आडंबरों और कर्मकांडों को अस्वीकार करते हुए सीधे हृदय से ईश्वर की भक्ति पर बल देता है। यह सम्प्रदाय सभी धर्मों की मूलभूत एकता में विश्वास रखता है और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बना। दादू पंथ की शिक्षाओं में सदाचार, ईमानदारी, और सभी प्राणियों के प्रति प्रेम का संदेश निहित है।

प्रवर्तक

इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक दादू दयाल जी हैं, जिनका जन्म 1544 ईस्वी में हुआ था। दादू दयाल जी एक महान संत और समाज सुधारक थे जिन्होंने अपनी सरल और मार्मिक वाणी के माध्यम से जनसामान्य के हृदय को छुआ। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन मानव सेवा और आध्यात्मिक शिक्षा के प्रचार-प्रसार में व्यतीत किया। दादू दयाल जी की शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं और लाखों लोगों के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर रही हैं।

सगुण /निर्गुण

दादू पंथ निर्गुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय ईश्वर के निराकार, निर्विशेष और सर्वव्यापी स्वरूप की उपासना पर बल देता है। दादू दयाल जी के अनुसार ईश्वर किसी विशेष रूप, आकार या गुण से परे है और वह सभी प्राणियों के हृदय में निवास करता है। इसलिए ईश्वर तक पहुँचने के लिए किसी बाहरी आडंबर या मूर्ति पूजा की आवश्यकता नहीं है।

प्रमुख पीठ/मंदिर

दादू पंथ के कई महत्वपूर्ण केंद्र हैं:

  • नरायणा (नरैना) – यह दादू पंथ का प्रमुख पीठ है

  • जयपुर – यह भी एक प्रमुख केंद्र है

  • भैराणा, करडाला, सांभर, आमेर – अन्य प्रमुख स्थल

अलख दरीबा – दादू पंथ के सत्संग स्थल को अलख दरीबा कहा जाता है।

रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ

दादू पंथ की समृद्ध साहित्यिक परंपरा है:

गरीबदास कृत:

  • अनभै प्रबोध

  • अध्यात्म प्रबोध

  • साखी

खेमदास कृत:

  • कर्म-धर्म संवाद

  • सुख संवाद

  • चितावणी

  • योग संग्रहण

मंगलराम जी:

  • सुंदरोदय

अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ:

  • दादूजी की वाणी

  • जनगोपाल कृत दादू जन्म लीला परची

  • माधोदास कृत संत गुण सागर

  • राघव दास कृत भक्तमाल

  • लालदास कृत नाम माला, पंथ परीक्षा

विशेष तथ्य: दादू जी के उपदेश ढूँढ़ाड़ी भाषा में हैं।

विशिष्ट तथ्य

दादू पंथ की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:

शिष्य परंपरा:

  • दादूजी के 152 शिष्य थे

  • इनमें 52 प्रमुख शिष्य ’52 स्तंभ’ कहलाये

पाँच शाखाएँ:

  1. विरक्त घुमन्तु साधु – ये संन्यासी जीवन व्यतीत करते थे

  2. खालसा – दादू के पुत्र गरीबदास इस शाखा के प्रवर्तक थे। ये नरायणा (नरैना) की शिष्य परंपरा को मानते हैं

  3. उत्तरादे व स्थानधारी – इस शाखा के प्रवर्तक बनवारीदास हैं। इनका प्रमुख केन्द्र रतिया (हिसार), हरियाणा में है। राजस्थान छोड़कर उत्तर की ओर जाने के कारण इस शाखा के अनुयायी ‘उत्तरादे’ कहलाये

  4. खाकी – भस्म लगाने वाले व जटा रखने वाले साधु

  5. नागा – इस शाखा के प्रवर्तक सुंदरदास जी हैं। यह साधु शस्त्र भी रखते थे तथा जयपुर राज्य में दाखिली सैनिक के रूप में कार्य करते थे

दादू दयाल के प्रमुख शिष्य

(1) संत रज्जब जी

संत रज्जब जी का जन्म 1567 ईस्वी में जयपुर में हुआ था। इनकी एक独特 विशेषता यह थी कि यह संपूर्ण जीवन दूल्हे के वेश में रहे। इनका प्रमुख ग्रंथ ‘रज्जब वाणी’ और ‘सर्वंगी/सर्वांगयोग’ है। इनकी प्रमुख पीठ ‘सांगानेर’ में स्थित है। संत रज्जब जी ने संसार को ‘वेद’ और सृष्टि को ‘कुरान’ कहा है, जो उनके सर्वधर्म समभाव की भावना को दर्शाता है। इन्होंने ‘अंगवधू/अंग बन्धु’ में दादू दयाल जी के प्रवचनों का संग्रह किया है, जो दादू पंथ की एक महत्वपूर्ण धरोह है।

(2) संत बालिंद जी

संत बालिंद जी दादू दयाल जी के प्रमुख शिष्यों में से एक थे। इनकी रचना ‘आरिलो’ है जो दादू पंथ के साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। संत बालिंद जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से दादू दयाल जी की शिक्षाओं का प्रसार किया और इस आध्यात्मिक परंपरा को समृद्ध किया।

(3) संत सुंदरदास

संत सुंदरदास का जन्म 1596 ईस्वी/1598 ईस्वी में दौसा में हुआ था। राजस्थान सरकार के धरोहर संरक्षण संवर्धन प्राधिकरण के पैनोरमा के अनुसार यह एक कवि थे। इनके द्वारा 42 ग्रंथों की रचना की गई, जिनमें ज्ञान समुद्र, ज्ञान सवैया (सुंदर विलास), बारह अष्टक, स्वप्न प्रबोध, वेद विचार, सुख समाधि, रामजी अष्टक, गुरुदेव महिमा अष्टक, अजब ख्याल अष्टक, साखी, विवेक चितावनी आदि प्रमुख हैं। इनकी भाषा ‘पिंगल’ है, जो उनकी साहित्यिक विशेषता को दर्शाती है।

(4) संत गरीबदास जी

संत गरीबदास जी का जन्म 1575 ईस्वी में हुआ था। यह दादू दयाल जी के ज्येष्ठ पुत्र थे और उनकी मृत्यु के पश्चात् दादू पंथ की गद्दी के प्रमुख बने। संत गरीबदास जी दादू पंथ की खालसा शाखा के प्रवर्तक थे। इन्होंने दादू पंथ को संगठित रूप प्रदान किया और इसकी परंपराओं को सुदृढ़ किया।

(5) जगन्नाथ जी

जगन्नाथ जी का जन्म 1640 ईस्वी में आमेर में हुआ था। इनके द्वारा रचित ‘गीतासार’ और ‘गुण गंजनामा’ योग वाशिष्ठ सार प्रसिद्ध है। साथ ही हरड़ेवाणी का संकलन जगन्नाथ जी और संतदास जी ने मिलकर किया। इनकी रचनाएँ दादू पंथ के दार्शनिक पक्ष को समृद्ध करती हैं।

(6) बखान जी

बखान जी का जन्म 1600 ईस्वी में नरायणा, जयपुर में हुआ था। बखान जी के दोहे ‘बखान जी की वाणी’ में संकलित हैं। इनकी रचनाएँ दादू पंथ की साहित्यिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और आज भी इनका अध्ययन किया जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. दादू पंथ के संस्थापक कौन हैं?
दादू पंथ के संस्थापक दादू दयाल जी हैं, जिनका जन्म 1544 ईस्वी में हुआ था।

2. यह सम्प्रदाय सगुण उपासना में विश्वास रखता है या निर्गुण?
दादू पंथ निर्गुण भक्ति में विश्वास रखता है और ईश्वर के निराकार स्वरूप की उपासना पर बल देता है।

3. इस सम्प्रदाय का मुख्य पीठ कहाँ स्थित है?
इस सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ नरायणा (नरैना) में स्थित है। जयपुर, भैराणा, करडाला, सांभर और आमेर अन्य प्रमुख स्थल हैं।

4. दादू पंथ की कितनी शाखाएँ हैं और कौन-कौन सी हैं?
दादू पंथ की पाँच शाखाएँ हैं:

  • विरक्त घुमन्तु साधु

  • खालसा

  • उत्तरादे व स्थानधारी

  • खाकी

  • नागा

5. दादू जी के कितने शिष्य थे?
दादू जी के 152 शिष्य थे, जिनमें 52 प्रमुख शिष्य ’52 स्तंभ’ कहलाये।

6. दादू पंथ के सत्संग स्थल को क्या कहा जाता है?
दादू पंथ के सत्संग स्थल को अलख दरीबा कहा जाता है।

निष्कर्ष

दादू पंथ भारतीय भक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसने सामाजिक समानता और निर्गुण ईश्वर भक्ति का संदेश फैलाया। दादू दयाल जी की शिक्षाएँ और उनके शिष्यों का योगदान राजस्थान की धार्मिक-सामाजिक पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। इस सम्प्रदाय ने न केवल आध्यात्मिक जगत में बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रयास किया। आज भी, सैकड़ों वर्षों बाद, दादू पंथ अपने अनुयायियों के बीच जीवित है और दादू दयाल जी के संदेश लोगों को प्रेरणा दे रहे हैं। उनकी शिक्षाएँ मानवता, समानता और आध्यात्मिक जागृति का शाश्वत संदेश देती हैं, जो आज के युग में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके अपने समय में थीं।

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