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राजस्थान की धरती से उत्पन्न एक ऐसे अनूठे सम्प्रदाय के बारे में जिसने पर्यावरण संरक्षण और जीवन रक्षा को ही सर्वोच्च धर्म माना – विश्नोई सम्प्रदाय। यह सम्प्रदाय न केवल एक धार्मिक आंदोलन था, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक जीवंत दर्शन है जो आज पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय
विश्नोई सम्प्रदाय 15वीं शताब्दी में राजस्थान में उत्पन्न एक प्रमुख निर्गुण भक्ति सम्प्रदाय है जिसने पारिस्थितिकी संतुलन और जीवन मूल्यों को केंद्र में रखकर एक अनूठी आध्यात्मिक और सामाजिक परंपरा की स्थापना की। यह सम्प्रदाय मुख्य रूप से राजस्थान के थार मरुस्थल क्षेत्र में फैला हुआ है और आज दुनिया भर में अपने पर्यावरण संरक्षण के अद्वितीय संकल्प के लिए जाना जाता है।
सम्प्रदाय
विश्नोई सम्प्रदाय एक ऐसा आध्यात्मिक और सामाजिक मार्ग है जो मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर बल देता है। यह सम्प्रदाय सभी जीवों के प्रति दया, प्रकृति संरक्षण और सादगीपूर्ण जीवन को महत्व देता है। विश्नोई समुदाय ने सिद्ध किया है कि धर्म और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं और सच्ची भक्ति प्रकृति की रक्षा में निहित है।
प्रवर्तक
इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक जाम्भोजी/जम्भेश्वर हैं, जिनका जन्म 1451 ईस्वी में पीपासर (नागौर) में हुआ था। जाम्भोजी एक दूरदर्शी संत और समाज सुधारक थे जिन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि से भविष्य में आने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों को पहचाना और मानवता को बचाने के लिए एक व्यावहारिक दर्शन प्रस्तुत किया। उन्होंने 1485 ईस्वी में कार्तिक कृष्ण-8 को समराथल (बीकानेर) में विश्नोई संप्रदाय का प्रवर्तन किया।
सगुण /निर्गुण
विश्नोई सम्प्रदाय निर्गुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय ईश्वर के निराकार, निर्विशेष और सर्वव्यापी स्वरूप की उपासना पर बल देता है। जाम्भोजी के अनुसार ईश्वर किसी विशेष रूप या आकार में सीमित नहीं है बल्कि वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है और प्रकृति के माध्यम से स्वयं को प्रकट करता है।
प्रमुख पीठ/मंदिर
विश्नोई सम्प्रदाय के कई महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं:
मुकाम (तालवा, बीकानेर) – यह विश्नोई सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थस्थल है
जाम्भोलाव (जोधपुर)
पीपासर (नागौर)
समराथल (बीकानेर)
जांगलू (बीकानेर)
लोहावट (जोधपुर)
लालासर (बीकानेर)
रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ
विश्नोई सम्प्रदाय की समृद्ध साहित्यिक परंपरा है:
जाम्भोजी कृत:
जन्म सागर
जन्मसंहिता
विश्नोई धर्म प्रकाश
सबदवाणी
अन्य महत्वपूर्ण रचनाएँ:
सुरजनदास पूनिया कृत ‘कथा हरिगुण’
विशिष्ट तथ्य
विश्नोई सम्प्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:
नामकरण: (20+9) प्रकार की शिक्षाओं के कारण यह संप्रदाय विश्नोई कहलाया। विश (20) + नोई (9) = 29 नियमों वाला सम्प्रदाय।
गुरु परंपरा: इनके गुरु गोरखनाथ जी थे (मानस गुरु)।
दर्शन: इन्होंने संसार को ‘गोवलवास’ (अस्थाई निवास) बताया।
पर्यावरण संरक्षण: यह प्रकृति प्रेमी संप्रदाय है। विश्नोई समुदाय ने 1730 में खेजड़ली बलिदान दिया था जब अमृता देवी के नेतृत्व में 363 लोगों ने खेजड़ी के पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी।
29 नियम: विश्नोई सम्प्रदाय के 29 नियमों में जीव हत्या न करना, हरा पेड़ न काटना, दया भाव रखना, सत्य बोलना, ईमानदारी से जीवन यापन करना आदि शामिल हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
विश्नोई सम्प्रदाय के संस्थापक जाम्भोजी/जम्भेश्वर हैं, जिनका जन्म 1451 ईस्वी में पीपासर (नागौर) में हुआ था।
2. यह सम्प्रदाय सगुण उपासना में विश्वास रखता है या निर्गुण?
विश्नोई सम्प्रदाय निर्गुण भक्ति में विश्वास रखता है और ईश्वर के निराकार स्वरूप की उपासना पर बल देता है।
3. इस सम्प्रदाय का नाम ‘विश्नोई’ क्यों पड़ा?
(20+9) प्रकार की शिक्षाओं के कारण यह संप्रदाय विश्नोई कहलाया। विश (20) + नोई (9) = 29 नियमों वाला सम्प्रदाय।
4. विश्नोई सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थस्थल कहाँ है?
इस सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थस्थल मुकाम (तालवा, बीकानेर) में है। अन्य प्रमुख तीर्थस्थलों में जाम्भोलाव, पीपासर, समराथल आदि शामिल हैं।
5. विश्नोई सम्प्रदाय की सबसे उल्लेखनीय विशेषता क्या है?
विश्नोई सम्प्रदाय की सबसे उल्लेखनीय विशेषता पर्यावरण संरक्षण है। यह प्रकृति प्रेमी संप्रदाय है जिसने पेड़ और जीव बचाने के लिए बलिदान देने की अनूठी परंपरा स्थापित की।
6. विश्नोई सम्प्रदाय के गुरु कौन थे?
इनके गुरु गोरखनाथ जी थे (मानस गुरु)।
निष्कर्ष
विश्नोई सम्प्रदाय भारतीय भक्ति आंदोलन का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसने पर्यावरण संरक्षण और जीवन रक्षा को सर्वोच्च धर्म का दर्जा दिया। जाम्भोजी की शिक्षाएँ और विश्नोई समुदाय का बलिदान आज पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। इस सम्प्रदाय ने सिद्ध किया कि मानवता का सच्चा धर्म प्रकृति और सभी जीवों की रक्षा करना है। आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, विश्नोई सम्प्रदाय का दर्शन और उनके 29 नियम अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। यह सम्प्रदाय न केवल एक धार्मिक परंपरा है बल्कि मानवता के भविष्य के लिए एक आवश्यक जीवन दर्शन है।