रामानुज सम्प्रदाय

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भारतीय दर्शन के एक ऐसे महान सम्प्रदाय के बारे में जिसने विशिष्टाद्वैत दर्शन की नींव रखी और भक्ति आंदोलन को नई दिशा दी – रामानुज सम्प्रदाय (श्री सम्प्रदाय)। यह सम्प्रदाय वैष्णव परंपरा का एक प्रमुख स्तंभ है जिसने राजस्थान में गलता पीठ के माध्यम से अपनी गहरी पैठ बनाई।

प्रमुख धार्मिक सम्प्रदाय

रामानुज सम्प्रदाय, जिसे श्री सम्प्रदाय के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण भारत में उत्पन्न होकर पूरे भारत में फैला एक प्रमुख वैष्णव सम्प्रदाय है। यह सम्प्रदाय विशिष्टाद्वैत दर्शन पर आधारित है जो जीव और ब्रह्म के बीच विशिष्ट संबंध की व्याख्या करता है। राजस्थान में इस सम्प्रदाय का विशेष महत्व है जहाँ गलता पीठ इसका प्रमुख केंद्र बना।

सम्प्रदाय

रामानुज सम्प्रदाय एक ऐसा दार्शनिक और आध्यात्मिक मार्ग है जो विशिष्टाद्वैत दर्शन में विश्वास रखता है – अर्थात जीव और ब्रह्म एक ही हैं परंतु विशेषणों में भिन्न हैं। इस संप्रदाय को रामावत, रामा-नंदी संप्रदाय भी कहा जाता है। यह सम्प्रदाय भक्ति के साथ-साथ ज्ञान को भी महत्व देता है और विष्णु की भक्ति पर विशेष बल देता है।

प्रवर्तक

इस महान सम्प्रदाय के संस्थापक रामानुजाचार्य हैं, जिनका जन्म 1017 ईस्वी में श्री पेरुमबुदुर, तमिलनाडु में हुआ था। रामानुजाचार्य एक महान दार्शनिक, संत और समाज सुधारक थे जिन्होंने विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया। उन्होंने जाति-पाति के भेदभाव को दूर करके सभी के लिए भक्ति के द्वार खोले और भक्ति आंदोलन को एक नई दिशा प्रदान की।

सगुण /निर्गुण

रामानुज सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है। यह सम्प्रदाय विष्णु के सगुण रूप की उपासना पर बल देता है और मोक्ष प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु की कृपा को आवश्यक मानता है। इसके अनुयायी ईश्वर के सगुण रूप की भक्ति को ही मोक्ष का साधन मानते हैं और प्रपत्ति मार्ग (आत्मसमर्पण) का अनुसरण करते हैं।

प्रमुख पीठ/मंदिर

रामानुज सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ गलता पीठ (जयपुर) में स्थित है। इस पीठ को उत्तरोत्रादि/उत्तर तोताद्रि, गालव तीर्थ भी कहा जाता है। गालव ऋषि ने गालव तीर्थ की स्थापना की थी। गलता पीठ के संस्थापक स्वामी कृष्णदास पयहारी थे, जिन्होंने इस पीठ को रामानुज सम्प्रदाय का उत्तरी भारत में प्रमुख केंद्र बनाया।

रचनाएँ प्रमुख ग्रंथ

रामानुज सम्प्रदाय की समृद्ध साहित्यिक परंपरा है:

रामानुज कृत:

  • ‘श्रीभाष्य’ – यह रामानुजाचार्य की सबसे प्रसिद्ध रचना है जो ब्रह्मसूत्र पर भाष्य है

अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं में वेदार्थसंग्रह, वेदान्तदीप, वेदान्तसार, शरणागतिगद्य, श्रीरंगगद्य, श्रीवैकुण्ठगद्य, नित्यग्रन्थ आदि शामिल हैं।

विशिष्ट तथ्य

रामानुज सम्प्रदाय की कुछ विशेष बातें इस प्रकार हैं:

  1. दार्शनिक आधार: यह सम्प्रदाय विशिष्टाद्वैत दर्शन पर आधारित है

  2. उपासना पद्धति: विष्णु के सगुण रूप की उपासना पर विशेष बल

  3. वैकल्पिक नाम: इस संप्रदाय को रामावत, रामा-नंदी संप्रदाय भी कहा जाता है

  4. प्रमुख पीठ: गलता पीठ इस सम्प्रदाय का राजस्थान में प्रमुख केंद्र है

  5. स्थापना: गलता पीठ की स्थापना स्वामी कृष्णदास पयहारी ने की

  6. प्रपत्ति मार्ग: इस सम्प्रदाय में आत्मसमर्पण को मोक्ष का मुख्य साधन माना गया है

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. रामानुज सम्प्रदाय के संस्थापक कौन हैं?
रामानुज सम्प्रदाय के संस्थापक रामानुजाचार्य हैं, जिनका जन्म 1017 ईस्वी में श्री पेरुमबुदुर, तमिलनाडु में हुआ था।

2. यह सम्प्रदाय सगुण उपासना में विश्वास रखता है या निर्गुण?
रामानुज सम्प्रदाय सगुण भक्ति में विश्वास रखता है और विष्णु के सगुण रूप की उपासना पर बल देता है।

3. इस सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ राजस्थान में कहाँ स्थित है?
इस सम्प्रदाय का प्रमुख पीठ राजस्थान में गलता पीठ (जयपुर) में स्थित है।

4. रामानुज सम्प्रदाय के वैकल्पिक नाम क्या हैं?
इस सम्प्रदाय को रामावत, रामा-नंदी संप्रदाय और श्री सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

5. रामानुजाचार्य की प्रमुख रचना कौन-सी है?
रामानुजाचार्य की प्रमुख रचना ‘श्रीभाष्य’ है।

6. गलता पीठ के संस्थापक कौन थे?
गलता पीठ के संस्थापक स्वामी कृष्णदास पयहारी थे।

निष्कर्ष

रामानुज सम्प्रदाय भारतीय वैष्णव परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसने विशिष्टाद्वैत दर्शन और भक्ति के प्रपत्ति मार्ग के माध्यम से आध्यात्मिक जगत को समृद्ध किया। रामानुजाचार्य के दार्शनिक विचारों और स्वामी कृष्णदास पयहारी जैसे संतों के प्रयासों से यह सम्प्रदाय दक्षिण से उत्तर भारत तक फैला। गलता पीठ इस सम्प्रदाय का राजस्थान में प्रमुख केंद्र बना और आज भी यहाँ से इसकी परंपराएँ जीवित हैं। रामानुज सम्प्रदाय की सगुण भक्ति और दार्शनिक गहनता ने न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक क्षेत्र में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाए और सभी के लिए भक्ति के द्वार खोले। इसका योगदान भारतीय संस्कृति और दर्शन के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा।

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